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पृष्ठ:Gandhi - Dakshin Afrika Ke Satyagraha (Hindi).pdf/१९८

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पकड़-थकड़ १६१ विचार कुछ विचित्र अवश्य लगा, पर इतना तो मुझे अच्छी तरह याद है कि anta-मलको बैठकमें बैठनेमे जो कछ सम्मान मेने माना होगा, अभियुक्त के पीथड़ेगे खड़े होने में उससे कहीं अधिक सम्मान समझा । उसमें प्रवेश करनेमें लेशमात्र भी क्षोभ मेरे मनमे हुआ, यह मुझे याद नही आता । अदालतमे तो सैकड़ों हिंदुस्तानी भाइयो, asia, मित्रों मादिके सामने में खड़ा था। ज्योही सजा सुनाई गई, सिपाही मुझे, कैदियोको बाहर के जानेके दरवाजेसे उस जगह ले गया, जहा कैदी पहले रखे जाते हैं। M उस वक्त मुझे अपने आस-पास सब कुछ शून्य, निस्तष्य दिखाई दिया। कैदियोके बैठनेके लिए एक वेच पड़ी थी। उसपर बैठनेको कहकर और दरवाजा बंद करके पुलित कर्मचारी चलता बना। यहां मुझे धोम अवश्य हुआ । गहरे दिवार डब गया। कहाँ है घर-बार ! कहां 'वकालत | कहा है समाए। यह सब क्या स्वप्नवत् था और आज में कैदी हूं ! दो महीनेमे क्या होगा ? दो महीने पूरे काटनेही होगे ? लोग अपने वचन के अनुसार बेल के माए तो दो महीने क्यो बिताने पड़ेगे ? पर वे न आएं तो बो महीने कैसे पहाडसे हो जाएंगे? इन विचारोंको लिखने में जितना समय लग रहा है उसका सौबा हिस्सा भी दिमाग में इन और ऐसे अन्य विचारोके जानेमे नही लगा । ये विचार ज्योही मनमे आये, से सज्जित हुआ। यह कितना बड़ा मिष्या- भिमान है ! मे तो जेरुको महल मनवानेवाला हूँ ! खूनी कानूनका सामना करते हुए जो कुछ सहन करना पडे उसे दुख नही बल्कि सुख मानना चाहिए। उसका सामना करते हुए जान-माल सव अर्पण कर देना पड़े तो इसे तो सत्याग्रहमें बड़ा मानद मानना चाहिए। यह सारा ज्ञान माल कहां चला गया ? ये विचार मनमे आते ही में फिर होशमें माया