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पृष्ठ:Gandhi - Dakshin Afrika Ke Satyagraha (Hindi).pdf/२०२

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पकड़-पकड़ अगर आकस्मिक सयोग मात्र हो तो यह चमत्कार-सा माना जायगा । K इस जेलमे सादी कंदवाले कैदियोको भोजनमे सवेरे मकई- की लपसी मिलती थी । उसमे नमक नही होता था, पर हर कैदीको अलग से थोडा नमक दिया जाता था। दोपहरको बारह वजे पाव भर भात, थोड़ा नमक और भाघी छटांक घी और पाव भर डबल रोटी दी जाती थी। शामको फिर मकईके आटेकी रुपसी और उसके साथ थोडी तरकारी, मुख्यत आलू दिया जाता था। आलू छोटे हो तो दो और बड़े हो तो एक दिया जाता था। इस खुराकसे किसीका पेट नहीं भरता । चावल गीला पकाया जाता था । वहाके डाक्टरसे हमने कुछ मसाला मागा । उन्हें बताया कि हिदुस्तानकी जेलोमे भी मसाला मिलता है। "यह हिंदुस्तान नही है और कैदीके लिए स्वाद होता ही नही । इसलिए मसाला भी नही हो सकता ।" यह दोटूक जवाब मिला। हमने दालकी मांग की, क्योकि उपर्युक्त आहारमे मासपेशी या पट्ठे बनानेका गुण नही था। डाक्टरने जवाब दिया- "कैदियोको डाक्टरी दलील नही देनी चाहिए । पट्टे बनानेवाली खुराक आप लोगोको दी जाती है, क्योंकि हफ्ते में दो बार मक्केके बदलेमे उबली हुई मटर दी जाती है ।" मनुष्यका जठर यों हफ्ते मे या पखवाडे में भिन्न-भिन्न गुणोवाला आहार भिन्न-भिन्न समयपर लेकर उसके सत्यको खीच ले सके तो डाक्टरकी दलील सही थी। बात यह थी कि डाक्टरका इरादा किसी तरह हमारे अनुकूल होनेका था ही नहीं । सुर्पारटेडेटने हमारी यह माग मजूर कर ली कि अपना खाना हम खुद पका लिया करे । थंवी नामको हमने अपना पाक- शास्त्री चुना । रसोईमे उसको बहुत झगडा करना पड़ता । शाक-भाजी तौलमे कम मिले तो वह पूरी मांगता। यही बात दूसरी चीजो के बारेमें भी थी । केवल दोपहरका खाना