E दक्षिण अफ्रीकाका सत्याग्रह इसपर अलवर्ट कार्टराइट मुझसे मिलने आये और अपने साथ जनरल स्मट्सका बनाया हुआ या पसद किया हुआ समझोतेका मसविदा भी ले आये। उसकी भाषा गोल- मटोल थी । वह मुझे नहीं रुची । फिर भी एक परिवर्तनके साथ उस मसविदेपर दस्तखत करनेको में खुद तैयार था । पर मैने उन्हें बताया कि बाहरवालोकी इजाजत होनेपर भी जेलके अपने साथियोकी राय लिये विना मे हस्ताक्षर नही कर सकता ।इस मसविदेका मतलब यह था कि हिंदुस्तानी अपने परवाने स्वेच्छासे बदलवा ले । उनपर किसी कानूनका प्रयोग नही हो सके, नये परवानेका रूप सरकार भारतीयोके साथ मशविरा करके ते करे और भारतीय जनताका वडा भाग स्वेच्छा से परवाना ले ले तो सरकार खूनी कानूनको रद कर देगी और अपनी खुशीसे लिए हुए परवानेको वाकायदा मान लेनेके लिए एक नया कानून पास करेगी। खूनी कानून रद करनेकी बात इस मसविदेमें स्पष्ट नहीं थी । मेरी दृष्टिसे उसे स्पष्ट करने के लिए जो सुधार आवश्यक था वह मैने सुझाया। पर अलबर्ट कार्टराइटको इतना परिवर्तन भी पसंद नही आया । उन्होंने कहा - "जनरल स्मट्स इस मसविदेको अतिम मानते है । मैंने खुद भी इसे पसंद किया है और इस बातका तो में आपको इतमीनान दिलाता हूं कि अगर आप सबने परवाने ले लिये तो खूनी कानूनको रद हुआ ही समझिये ।" मैने जवाब दिया- "समझौता हो या न हो, पर आपकी सहानुभूति और सहायता के लिए हम सदा आपके महसानमद रहेंगे। में एक भी गैरजरूरी फेरफार नहीं कराना चाहता । जिस भाषासे सरकारकी प्रतिष्ठाकी रक्षा होती हो में उसका विरोध नहीं करूंगा । पर जहा मुझे खुद ही अर्थके विषयमे शका हो वहा तो मुझे हेर-फेर सुभाना ही होगा और अंतको अगर समझोता होना ही है तो दोनो पक्षोको मसदेमे
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