समझौतेका विरोध : मुझपर हमला २०३ लगेगा । अत. सच पूछिये तो इस समझौतेका विरोध किया ही नही जा सकता । "अब इस दलीलपर विचार करे कि खूनी कानून रद किये जानेके पहले हम अपना हाथ कैसे कटा दे 'क्यों अपने शस्त्र छोड दे ? इसका जबाव तो बहुत आसान है । सत्याग्रही भयको तो कोसो दूर रखता हूँ इसलिए विश्वास करते वह कभी डरता ही नही । स्वीस वार विश्वासका घात हो तो भी इक्की- सवी बार विश्वास करनेको तैयार रहता है। कारण यह है कि सत्याग्रही अपनी नाव विश्वासके सहारे ही चलाता है और विश्वास रखनेमे हम अपने हाथ कटा देते हैं यह कहना यह प्रकट करना है कि हम सत्याग्रहको नही समझते । " मान लीजिये, हमने अपनी इच्छासे नये परवाने के लिये । पीछे सरकार विश्वासघात करती है और कानूनको रद नहीं करती। तो क्या उस वक्त हम सत्याग्रह नहीं कर मकते ? यह परवाना के लेनेपर भी हम मुनासिव वक्तपर उसे दिखानेसे इन्कार कर दे तो उसकी क्या कीमत होगी ? तब जो हजारो हिंदुस्तानी छिपे तौरपर ट्रासवालमे दाखिल हो जाए। सरकार उनमे और हममे किस तरह अंतर कर सकेगी ? अत कानून हो या न हो, किसी भी दशामे सरकार हमारी सहा- यताके विना हमपर प्रतिबंध नहीं लगा सकती । कानूनका अर्थ इतना ही है कि जो रोक सरकार लगाना चाहती है उसे हम स्वीकार न करे तो हम दडके पात्र होते है । और आम- तौरसे ऐसा होता है कि मनुष्य सजाके डरसे अकुक्षके अधीन होते है; पर सत्याग्रही इस सामान्य नियमका उल्लघन करता है। यह अकुशके अधीन होता है तो सजाके डरसे नही; बल्कि उसके माननेमें लोक-कल्याण है, यह मानकर अपनी इच्छासे वैसा करता है। ठीक यही स्थिति हमारी इस वक्त इन परवानोके बारेमे है। इस स्थितिको सरकार कैसा ही विष्वास-
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