गोरे सहायक २२१ १ २३ गोरे सहायक इस लडाईमे इतने अधिक मोर प्रतिष्ठित यूरोपियनोने हिंदुस्तानी कोमकी ओरसे आगे बढ़कर हिस्सा लिया कि इस स्थानपर उनका एक साथ परिचय करा देना अनुचित नहीं समझा जायगा । इससे आगे चलकर जब जगह-जगह उनके नाम आयगे तो उस वक्त पाठकोको वे अपरिचित नही लगेगे और लडाईके चलते वर्णनमे उनका परिचय देनेके लिए मुझको रुकना भी नही पडेगा। जिस क्रमसे में उनके नाम दे रहा हु उस क्रमको पाठक उनकी प्रतिष्ठा या सहायताके मूल्यका क्रम न माने । उसको कुछ तो उनसे परिचय होनेके कारण और कुछ लड़ाईके जिस-जिस उपविभागमे उनकी मदद मिली उसके क्रम से रखा हुआ समझना होगा । इनमे पहला नाम अल्वर्ट वेस्टका आता है । भारतीय जनता के साथ उनका सबध तो लडाईके पहले ही जुड़ गया । मेरा उनका वास्ता तो और भी पहलेका था । मेने जव जोहान्सबर्ग में दफ्तर खोला तब मेरा कुटुब मेरे साथ नही था । पाठकोको याद होगा कि दक्षिण अफ्रीकाके भारतीयोका तार पाकर १९०३ ई० मे में यकायक रवाना हो गया था और वह भी एक बरसके अदर लौट आनेके इरादेसे । जोहान्सबर्गमे एक निरामिप भोजन नाह था । उसमे में नियमसे दोपहर और शामको खाना खाने जाया करता था । वहा वेस्ट भी आते और वही हमारी जान-पहचान हुई । वह एक और यूरोपियन के सामने छापाखाना चलाते थे । १९०४ मे जोहान्सबर्गके हिदुस्तानियोमे भयानक प्लेग फैला। में पीडितोकी सेवामे लग गया और उक्त भोजन-
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