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पृष्ठ:Gandhi - Dakshin Afrika Ke Satyagraha (Hindi).pdf/२२९

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२२२ दक्षिण अफीकाका सत्याग्रह गुहमे मेरा जाना अनियमित हो गया । जव जाता भी तब मेरी छूत दूसरोको लगनेका डर न रहे इस ख्यालसे और भोजन करनेवालोके आने के पहले ही वहां हो जाता। जब दो दिन लगातार मुझे नही देखा तव वेस्ट घबराये । उन्होने अल- बारोंमें देखा कि में प्लेग पीड़ितोकी सेवामे लगा हूँ। तीसरे दिन सवेरे ६ बजे मे हाथ-मुह धो रहा था कि वेस्टने मेरे कमरेका दरवाजा खटखटाया। मैने दरवाजा खोला तो वेस्टका हंसता चेहरा दिखाई दिया 1 वह तुरंत ही प्रसन्न होकर बोल उठे - "तुम्हें देखकर इतमीनान हुआ । तुम्हे भोजन- गृहमे न देखा तो में घबराया । मुझसे तुम्हारी कोई मदद हो सकती हो तो जरूर कहता।" मैने हसकर जवाब दिया- "रोमियोकी सेवा ? "क्यो नही ? में जरूर तैयार हू ।" इस विनोदके वीच मेने अपनी बात सोच ली। मैने कहा - " आपसे मुझे दूसरे उत्तरकी आशा ही नहीं थी पर इस काम में तो मेरे बहुतसे मददगार है । आपसे तो में इससे अधिक कठिन काम लेना चाहता हूँ । मदनजीत मही है। 'इडियन ओपीनियन' के प्रेसको कोई देखने-सम्हालने- वाला नही । मदनजीतको तो मैने प्लेगके काममें लगा लिया है । आप डर्बन जायें और उस कामको सम्हाले तो यह सच्ची सहायता होगी। इसमें कोई ललचानेवाली चीज तो है ही नहीं। में तो आपको एक बहुत छोटी रकम ही नजर कर सकता हूं-- १० पौड प्रति मास और जो प्रेसम नफा हो तो उसमे आया आपका होगा ।" "यह काम है तो जरा अटपटा मुझे अपने साझीदारखे इजाजत लेनी होगी। कुछ उगाही भी वसूल करना है । पर कोई चिता नही। आज शामतककी मुहल्त मुझे दे सकते है ?" "हा, छ. वजे हम पार्कमे मिले ।"