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पृष्ठ:Gandhi - Dakshin Afrika Ke Satyagraha (Hindi).pdf/२३०

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गोरे सहायक "मे जरूर पहुचूगा ।" २२३ इस निश्चयके अनुसार हम मिले| वेस्टने अपने साझी- दारकी अनुमति भी प्राप्त कर ली। उगाहीकी वसूली मुझे सौप दी और अगले दिन नामकी ट्रेनसे रवाना हो गये। एक महीनेके अंदर उनकी रिपोर्ट मिली — "इस छापेखानेमे नफा तो है ही नही, घाटा बहुत है । उगाही बहुत पड़ी है; पर हिसाव ठीक- ठिकानेसे नही रखा गया है। ग्राहकोंके पूरे नाम नही लिखे है, ठिकाना नही लिखा है। दूसरी अव्यवस्था भी बहुत है । यह सब में शिकायत के तौरपर नहीं लिख रहा हूं। मैं यहा नफेके लिए नहीं आया हूं। इसलिए यह ऊपर लिया हुआ काम छोडनेका नहीं, इसे पक्का समझिये । पर यह नोटिस में अमीस दिये देता हू कि आपको लंबे अरसेतक घाटा तो भरते हो जाना होगा ।" मदनजीत जोहान्सवर्ग आये थे ग्राहक बनाने और छापे- खानेके प्रबंधके बारेमे मुझसे बातचीत करने । मे हर महीने प्रेसका थोडा बहुत घाटा पूरा किया ही करता था । इससे यह जान लेना चाहता था कि इस गड्ढे और कितना पैसा कोंकना होगा। पाठकोको में बता चुका हू कि मदनजीतको गुरुके दिनोमें भी छापेखाने के कामका बिलकुल अनुभव नही था। इसलिए यह तो में शुरूसे ही सोचा करता था कि छापे- सानेका काम जाननेवाले किसी आदमीको उनके साथ कर सकू तो अच्छा हो। इस बीच प्लेग फैला और भवनजीत ऐसे कामोंमे तो बहुत कुशल और निर्भय थे। इसलिए उन्हे रोक लिया। इससे बेस्ट जब हमारी सहायता करनेको तैयार हो गये तो मैने इस अनपेक्षित प्रस्तावको सहर्ष स्वीकार कर लिया और उन्हें यह समझा दिया कि उन्हें केवल प्लेगके दिनोंके लिए नहीं, बल्कि सदाके लिए जाना होगा । इसीसे उनकी उपर्युक्त प्रकारकी रिपोर्ट मिली ।