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पृष्ठ:Gandhi - Dakshin Afrika Ke Satyagraha (Hindi).pdf/२३२

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गोरे सहायक २२५ भी पूरी सहायता करती । फिनिक्स उनको सब 'दादी' कहते और मानते। मिसेज वेस्टके बारेमे तो कुछ कहनेकी जरूरत ही नहीं । जब फिनिक्स माश्रमके बहुत से लोग जेल चले गये तब बेस्ट-कुटुबने मगनलाल गाधीके साथ मिलकर फिनिक्सको काम-काज सम्हाला । अखवार और छापेक्षानेके बहुतसे काम वेस्ट करते। मेरी और दूसरोकी अनुपस्थिति मे उनसे गोखलेके पास भेजे जानेवाले तार वही भेजते । अतमे जब वेस्ट भी पकड़ लिये गये (यद्यपि वह तुरत छोड दिये गये) तब गोखले घबराये और ऐज तथा पियसंनको भेजा । दूसरे है मि० रिच । इनके बारेमे लिख चुका हूं। ये भी लड़ाईके पहले ही मेरे दफ्तर दाखिल हो गये थे । मेरे पीछे मेरा काम सम्हाल सकनेकी आशासे वह वैरिस्टरी पास करने विलायत गये, वहाकी कमेटी ( साउथ अफ्रिकन ब्रिटिश इंडियन कमेटी) के कामको सारी जिम्मेदारी उन्हीपर थी । । तीसरे है मि० पोलक । वेस्टकी तरह उनसे जान-पहचान भी बनावास भोजन गृहमे हुई । वह भी क्षगभरमे 'ट्रासवाल क्रिटिक के उपसपादककी जगह छोडकर 'इसियन ओपीनियन मे आये। उन्होने लड़ाईके सिलसिलेने इंगलेट और पूरे हिंदु- स्तानमे भ्रमण किया, यह तो सभी जानते है । रिच विला- यत गये तो मैने उन्हें फिनिक्ससे अपने दफ्तरमे बुला लिया । वहा आर्टिकल्स दिये और फिर खुद भी वकील (एटर्नी) हो गये। पीछे व्याह भी किया । मिसेज पोलकको भी हिंदुस्तान जानता है। इन वहनने लढाई काममे अपने पतिका पूरा- पूरा हाथ वटाया । उसमे विघ्न कभी नहीं डाला। इस वक्त भी ये दपती असहयोगको लढाईमे हमारे सहयोगी न होते हुए भी हिंदुस्तानकी यथाशक्ति सेवा कर रहे हे । इनके बाद हमन केलेनवेकका नंबर आता है। इनका परिचय १५