इतिहास १७ पूछें कि दक्षिण अफ्रीकाने बसनेवाली जातियोंमे सबसे अधिक सुंदर तुम किसे कहोगे तो यह दावा वह अपनी जातिके लिए ही करेगा और इसमे मुझे उसका तनिक भी अज्ञान नही दिखाई देता । जो प्रयत्न सेडो आदि आज यूरोपमे अपने शागिर्दोंकी बाहु, छाती आदिके व्यवस्थित विकासके लिए कर रहे है वैसे किसी भी प्रयत्नके बिना, कुदरती तौरपर ही, इस जातिके अग-प्रत्यंग सुदृढ और गठे हुए दिखाई देते है । प्रकृतिका नियम है कि भूमध्य रेखाके नजदीक रहने- वालोंका चमडा काला ही होना चाहिए और हम यह मान ले कि प्रकृति जो-जो शकले गढ़ती है उसमे सुंदरता होती ही है तो सौदर्यविषयक अपने सकुचित और एकदेशीय विचारोसे वच जायं । इतना ही नही, हिंदुस्तानमे अपने ही चमड़ेको कुछ काला पाकर हमारे मनमे जो अशोभन लज्जा और अरुचि उत्पन्न होती है उससे भी हम मुक्त हो सकते है । ये हवशी मिट्टी और फुसके गुंबददार झोंपडों में रहते है। इन झोपडोमे एक ही गोल दीवार होती है और ऊपर फूसका छप्पर । छप्पर भीतर लगे हुए एक संमेपर टिका होता है । दरवाजा एक ही होता है और इतना नीचा कि बिना के कोई अंदर नहीं जा सकता। यही दरवाजा हवाके आने-जानेका यस्ता होता है । उसमें किवाड तो शायद ही होते है । हम लोगोकी तरह ये लोग भी दीवार और जमीनको मिट्टी और गोवर-से लीपते है। ऐसा माना जाता है कि ये लोग कोई भी चौकोर चीज नही बना सकते। अपनी आखोंको उन्होंने केवल गोल चीज ही देखना और बनाना सिखाया है। हम प्रकृतिको भूमितिकी सरल रेखाएं, सीधी आकृतिया बनाते नही पाते और प्रकृतिके इन निर्दोष भोले-भाले बच्चोका ज्ञान उनके प्रकृतिके अनुभवपर ही आश्रित होता है ।
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