गोरे सहायक २३३ हाथ खाना पकाते, घरकी सफाई करते बरतन मांजते शर्माती नही थी, न उससे परहेज करती थी। वह मानती थी कि यह उपयोगी शरीरश्रम उनकी लेखन शक्तिको मंद करनेके बदल उसे उत्तेजित करता है और भाषा तथा विचारोंको एक प्रकारका आभिजात्य और गाभीर्य प्रदान करता है। यह वहन भी दक्षिण अफ्रीका गोरो पर जो कुछ असर डाल सकती थी उस सवका उपयोग भारतीय पक्षका समर्थन करनेमें किया था । तीसरी बहन थी मिस माल्टीनो । यह भी दक्षिण अफोकाके पुराने घरानेकी वयोवृद्ध महिला थी । इन्होंने भी भारतीयोंकी अपनी शक्तिभर सहायता की । पाठक पूछ सकते हैं कि इन सारे यूरोपियनोकी सहायता- का फल क्या रहा ? इसका जवाब में यह दूंगा कि फल बताने- के लिए यह प्रकरण नही लिखा गया है। उनमें से कुछका काम हो, जिसका उल्लेख ऊपर किया गया है, उसके फलका साक्षी रूप है ? पर इन हितेच्छु गोरोकी सारी सहायता- सहानुभूतिका नतीजा क्या निकला, यह सवाल पैदा हो सकता है। यह लड़ाई हो ऐसी थी कि उसका फल उसमें ही समाया हुआ था । यह लढाई थी स्वावलवत, मात्म-वाल और भग- बानपर भरोसा रखनेकी । गोरे सहायको के नाम गिना जानेका एक हेतु तो यह है कि दक्षिण अफ्रीका के सत्याग्रह के इतिहासमे उनसे मिली हुई सहायताका उल्लेख न हो तो वह इस इतिहासकी कमी मानी जायगी । मेने सभी गोरे सहायको के नाम नही दिये है। पर जितने दिये है उतनेसे सहायक मात्रके प्रति हम अपनी कृतज्ञता इस प्रकरणमे प्रकट कर देते है। दूसरा कारण है इस सिद्धान्तमे सत्याग्रही रूपसे अपनी श्रद्धा प्रकट करना कि यद्यपि कर्मविशेषका परिणाम हम स्पष्ट रीतिसे नही देख सकते हों, फिर भी शुद्ध चित्तते किये हुए कर्मका फल शुभ ही होता
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