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पृष्ठ:Gandhi - Dakshin Afrika Ke Satyagraha (Hindi).pdf/२४२

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और भीतरी कठिनाइय २३५ ही थी। ट्रांसवालके भारतीय ट्रांसवालके निमित्तसे सारे दक्षिण अफ्रीकाकी लड़ाई लड़ रहे थे । इससे नेटालमें पैदा हुई गलतफहमी दूर करनेके लिए भी मेरा डर्बन जाना जरूरी था । अतः मोका मिलते ही में वहां गया । 3. adनके हिदुस्तानियोंकी आम सभा की गई । कुछ मित्रोंने मुझे चेता दिया था कि इस सभामे तुमपर हमला - होनेवाला है। इसलिए या तो तुम सभामें जामो ही नहीं या अपने बचावका कुछ उपाय कर लो। दो में से एक भी बात मुझसे हो सकने वाली नहीं थी। नौकरको मालिक बुलाये मोर वह डरसे न जाये तो उसका सेवक धमं गया और मालिककी सजासे डरे तो वह सेवा कैसी ? जनताको सेवा सेवाकी खातिर करना aint धारपर चलता है। लोकसेवक स्तुति लेनेको तैयार हो जाता है तो निदासे कैसे माग सकता हे ? यतः मैं तो नियत समयपर समामें पहुंच ही गया । समझौता कैसे हुआ, यह समझाया। जो सवाल किये गये उनके जवाब भी दिये । यह सभा रातके कोई आठ बजे हुई थी। काम लगभग पूरा हो चला था कि इतनेमें एक पठान अपनी लाठी लेकर मंचपर चढ़ आया । इसी वक्त बत्तियां भी बुझ गईं। मैं स्थिति समझ गया । सभापति सेठ दाऊद मुहम्मद अपनी भेजपर चढ़ गये और लोगोको समझाने लगे । मेरा बचाव करनेवालोंने मुझे घेर लिया। मैने अपने बचावका कोई उपाय नहीं किया था। पर मैंने पीछे देखा कि जिन्हें हमलेका डर था वे तो सब तरहसे तैयार होकर आये थे । उनमें से एक तो अपनी जेबमें तमंचा रखकर आये थे और उसका खाली फेर भी किया। इस बीच पारसी वस्तमजी, जिन्होंने हमलेकी तैयारी देश की थी, विद्युत वेगसे दोड़कर थाने पर पहुंचे और पुलिस सुपरिटेंडेंट अलेक्जेंडरको खबर दी। उन्होंने पुलिसका