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पृष्ठ:Gandhi - Dakshin Afrika Ke Satyagraha (Hindi).pdf/२४५

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२३५ जितनी तफसीलके मैं मानता हूं कि प्रकट हो गया कि जमा सकी, जिनको रहती तो दुःखद दक्षिण श्रीकाका सत्याग्रह ओर शंकाशी वाचक वर्गके बीच एक कल्पित सवाद लिख डाला। जो-जो शंकाए और अाक्षेप मैने सुन रखे थे उन सबपर साथ मुझसे हो सका विचार किया । इसका फल अच्छा ही हुआ । यह तो उन लोगोंके दिलमे गलतफहमी जड़ न अगर वह सचमुच हुई होती या वनी परिणाम होता । समझोते को मानना न मानना केवल ट्रासवालके हिंदुस्तानियोका काम था। अत. उनके कामोसे उनकी और नेता तथा सेवकके रूपमे मेरी भी परीक्षा होनेवाली थी। बहुत ही थोडे हिंदुस्तानी रहे होगे जिन्होने अपनी इच्छासे परवाना नही ले लिया हो । इतने अधिक लोग परवाना लेने जाते थे कि परवाना देनेवाले अहलकारोंको दम मारनेकी फुरसत भी नही मिलती थी। भारतीय जनताको समझोते की शर्तों से जिनका पालन करना था उनका पालन उसने वडी शीघ्रता से कर दिया। सरकारको भी यह बात कबूल करनी पड़ी। मैने यह भी देखा कि गलतफहमियोने यद्यपि उग्र रूप ग्रहण कर लिया था, फिर भी उनका क्षेत्र बहुत ही सकुचित था । कुछ पठानोने जब कानून अपने हाथमे ले लिया और बल-प्रयोगका रास्ता पकड़ा तव भारी खलबली मच गई, पर इस खलबलीका विश्लेषण करने वैठिये तो मालूम हो जायगा कि उसकी कोई बुनियाद नही होती और अकसर तो वह केवल क्षणिक होती है । पर यह होते हुए भी उसका जोर आज भी दुनियामे कायम है, क्योकि खून-खरावीसे हम काप उठते है । पर हम धीरजके साथ विचार करने बैठे तो तुरंत मालूम हो जाय कि कापनेका कुछ भी कारण नही । मान लीजिये कि मीर आलम और उसके साथियोके प्रहारसे मेरा शरीर जखमी होने के बदले नष्ट हो गया होता और साथ ही यह भी मान लीजिये कि कोम