और भीतरी कठिनाइयां २३९ बुद्धिपूर्वक अनुद्विग्न और शांत रही होती, मीर आलम अपनी बुद्धि- का अनुसरण करते हुए दूसरा कुछ कर ही नहीं सकता था, यहसमझ- कर उसने उसके प्रति मित्रभाव और क्षमाभाव रखा होता तो इससे कोमकी कोई हानि नही हुई होती, बल्कि अतिशय लाभ ही हुआ होता। कारण यह है कि कौममें तो उस दशामे गलतफहमी- का अभाव होता और वह दूने जोशसे अपनी प्रतिज्ञापर अटल रहती और अपने कर्तव्यका पालन करती। मुझे तो विशुद्ध लाभ होता, क्योंकि सत्याग्रही इससे अधिक मंगल परिणामको तो कल्पना ही नही कर सकता कि अपने सत्यका माग्रह रखते हुए, सत्याग्रहके प्रसंगमे ही, वह अनायास मृत्यू प्राप्त करे । ऊपर दी हुई दलीले सत्याग्रहको जैसी लढाईपर ही लाग हो सकती है, क्योंकि उसमे वैर-भाव के लिए स्थान ही नही । आत्मशक्ति या स्वावलंबन ही एकमात्र साधन होता है। उसमें एकको दूसरेका मूह ताकते बैठे रहना नही होता। उसमे कोई नेता नहीं होता, इसलिए कोई सेवक भी नही, अथवा सभी नेता और सभी सेवक होते है । इसलिए प्रौढ-से- प्रौढ पुरुषकी मृत्यु भी युद्धको शिथिल नही करती, बल्कि उसका वेग और बढा देती है । यह सत्याग्रहका शुद्ध और मूल स्वरूप है। अनुभवमे हमे इसके दर्शन नही होते, क्योकि सभी बंर त्याग दे यह नही होता । सब सत्याग्रहका रहस्य समझते हों यह भी अनुभवमे देखनेमे नहीं आता । थोड़ोंको देखकर बहुसख्यक उनका मूढ अनुकरण करते हैं। फिर सामुदायिक और सामाजिक सत्याग्रहीका दासवालका प्रयोग तो टाल्स्टायके कथनानुसार पहला ही माना जायगा । में खुद शुद्ध सत्याग्रहका ऐति- हासिक उदाहरण नहीं जानता था । मेरा इतिहास- ज्ञान नगण्य हैं। इसलिए इस विषय मे कोई पक्की राय कायम नही कर सकता । पर सच पूछिये तो ऐसे ऐतिहासिक उदाहरणोसे
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