१५ दक्षिण अफ्रीकाका सत्याग्रह उनके इस मिट्टी के महकमे साज-सामान भी उनके अनुरूप ही होता है। यूरोपीय सभ्यता के प्रवेश के पहले ये पहनने- ओदने, सोने-बैठने सबमे चमडेका हो उपयोग करते थे । कुरसी मेज, सदूक पिटारा रखनेको तो इस 'महल' में जगह भी नही होती और अग्रेजीके आधारपर आज भी इनके दर्शन वहां शायद ही होते है । अब उनके घरोमे कवलका प्रवेश हो गया है। ब्रिटिश राजके पहुचने के पहले हबशी स्त्री- पुरुष लगभग नगे ही किंग करते थे। आज भी देहातमें बहुतेरे इसी तरह रहते हैं । गुह्य अंगोको वे एक चमसे ढक लेते है । कोई-कोई यह भी नही करते, पर इसका अर्थ कोई पाठक यह न कर ले कि ये लोग अपनी इंद्रियोको वशमे नही रख सकते । जहा एक बडा समुदाय किसी रूढिसे वधकर व्यवहार करता हो वहा यह बात बिलकुल मुमकिन है कि दूसरे समुदायको वह रूढि अयोग्य मालूम होती हो, फिर भी पहले समुदायकी निगाहमें उसमे तनिक भी दोष न हो। इन हवनियो- को एक दूसरेकी ओर ताकने झाकनेकी फुरसत ही नही होती । भागवतकार कहते हैं कि शुकदेवजी जब नगी नहाती हुई स्त्रियोके वीचसे होकर चले गए तो न उनके मनमे तनिक भी विकार उत्पन्न हुआ, न उन निष्पाप स्त्रियोको तनिक भी क्षोभ हुआ या जरा भी शर्म आई । मुझे इसमे कुछ भी अलोकिक नही दिखाई देता । हिंदुस्तानमे आज ऐसे मौकेपर हमसे कोई भी इतनी स्वच्छता, इतनी निर्विकारताका अनुभव नहीं कर सकता तो यह कुछ मनुष्य जातिकी पवित्रताकी सीमा नहीं है, बल्कि हमारे दुर्भाग्यकी निशानी है । हम जो इन लोगो को जगली मानते हैं यह तो हमारे अभिमानको प्रतिध्वनि है। जैसा हम मानते है वैसे जगली वे नहीं है । ये हबशी जव सहरमे आते है तब उनको स्त्रियोके लिए यह नियम है कि उन्हे छाती से घुटनेतकका भाग अवश्य ढक रखना
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