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पृष्ठ:Gandhi - Dakshin Afrika Ke Satyagraha (Hindi).pdf/२५१

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( २४४ } इस प्रकार मेरा दृढ विश्वास है कि जैसा दक्षिण अफ्रीकामे हुआ वैसा ही यहा भी होगा । कारण यह कि तपश्चर्यापर, सत्यपर, अहिंसापर मेरी अविचल श्रद्धा है । मैं इस बातको प्रक्षरण सत्य मानता हू कि सत्यका -- पालन करनेवाले के सामने सपूर्ण जगत् की समृद्धि रहती है धीर वह ईश्वरका साक्षात्कार करता है । हिंसा के सानिध्य में वैरभाव टिक नही सकता, इस वचनको भी में प्रकार सत्य मानता हूँ । कप्ट सहन करनेवालोंके लिए कुछ भी प्रश्चक्य नही होता, इस सूत्रका में उपासक हू । इन तीनो वस्तुप्रका मेल में कितने ही सेवकोंमे पाता हू । उनकी साधना कभी निष्फल नही होती, मेरा यह निरपवाद अनुभव है । । पर कोई कह सकता है कि दक्षिण अफ्रीकामें पूरी जीत होनेका अर्थ तो इतना ही है कि हिंदुस्तानी जैसे थे वैसे ही बने रहे। ऐसा कहनेवाला श्रज्ञानी कहलायेगा । दक्षिण अफ्रीकामे लडाई न लडी गई होती तो भाज दक्षिण अफ्रीकासे ही नहीं, बल्कि सारे अग्रेजी उपनिवेशोसे हिंदुस्तानियो के कदम उठ गये होते और किसीने उनकी खोज-खबर भी न ली होती । पर यह उत्तर यथेष्ट या सतोषजनक नहीं माना जायगा । यह दलील भी दी जा सकती है कि सत्याग्रह न किया गया होता और समझाने-बुझानेसे जितना काम हो सकता था उतना काम लेकर हम बैठ गये होते तो भाज जो स्थिति है वह नही होती। यह दलील यद्यपि सचाईसे खाली है, फिर भी जहा केवल दलीलो घोर घटकलोसे ही काम लिया जाता हो वहा किसकी दलीले और किसके अनुमान अच्छे हैं, यह कौन कह सकता है अटकले लगानेका हक सभीको है । जिसका जवाव नही दिया जा सकता, जिसका खडन नही किया जा सकता, वैसी बात तो यह है कि जो वस्तु जिस शस्त्रके द्वारा प्राप्त की जाती हैं, उसकी रक्षा उसी हथियार से हो सकती है। ?