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पृष्ठ:Gandhi - Dakshin Afrika Ke Satyagraha (Hindi).pdf/२६०

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जनरल स्मट्सका विश्वासघात (2) २५३ कौमका मान मोर मेरा अपना आत्मसम्मान भी समाया हुआ है। आपने मुझे उधार माल दिया, इसके लिए आपका अहसान मानता हूं, पर इसको या अपने व्यापारको में सर्वोपरि नही मान सकता । आपके पैसे मेरे लिए सोनेकी मुहरें हैं । जवलक मैं जीवित है तबतक अपने आपको बेचकर भी आपका पैसा भर सकता हूँ । पर मान लीजिए कि मेरा कुछ हो गया तो भी मेरी उगाही और मेरे मालको अपने हाथमे ही समझिए । आजतक आपने मेरा विश्वास किया है और मैं चाहता हूं कि अब भी आप विश्वास करे ।" यद्यपि यह दलील सोलहो जाने सही थी और काछलियाकी दृढता गोरे व्यापारियोंके लिए विश्वासका एक अतिरिक्त कारण थी, फिर भी इस वक्त उनपर उसका असर नही हो सकता था । हम सोते हुएको जगा सकते है, पर जो जागते हुए सोनेका ढोग करता हो उसको नही लगा सकते । गोरे व्यापारियो के विषयमें भी यही हुआ । उन्हें तो सेठ काछलियाको दवाना था। उनके पैसे को कोई खतरा न था । मेरे दफ्तरमे लेनवारोकी बैठक हुई। उनको मैने स्पष्ट शब्दोमे बता दिया कि काछलियापर जो दबाव आप लोग डाल रहे हे उसमे व्यापार नीति नहीं, राजनैतिक चाल है, व्यापारियोंको वैसा करना शोभा नहीं देता। इससे वे उलटे और चिढ गये । सेठ काछलियाके माल और उनकी उगाहीका जो लेखा मेरे पास था वह मैने उन्हे दिखाया और इससे यह सिद्ध किया कि उनका पावना पाई- पाई वसूल हो सकता है। इसके सिवा वे यह व्यापार दूसरेके हाथ बेच देना पसंद करें तो काछलिया यह सारा माल और पाant खरीदारके हवाले कर देने को तैयार है । यह न करे तो जो माल दुकान मौजूद है उसको असल दामपर ले ले और इसमे उन्हें कुछ घाटा लगे तो उसके एवजमे जो