अमरत स्मट्सका विश्वासघात (3) २५५ हूं। मेरी स्मृतिके अनुसार एक-दो मित्रोंने उनसे इसके लिए कहलाया भी, पर उनकी मदद लेना तो यह मान लेने जैसा होता कि खूनी कानूनके सामने सिर झुका देना बुद्धिमानी । अतः हम दोनोने निश्चय किया कि उनकी मदद हमें हरगिज न लेनी चाहिए। इसके सिवा हम दोनोंने यह भी सोचा कि अगर काछलिया थपने आपको दिवालिया करार दिया जाने दि तो उनका दिवाला दूसरोंके लिए ढालका काम देगा । कारण कि अगर सौमे नही तो ९० फीसदी दिवालोमे पावनेदारको कुछ-न-कुछ नुकसान उठाना ही पडता है। बत उसे अगर रुपयेमे आठ आने मिल जाए तो वह प्रसन्न होता है और बारह आने मिल जाएं तब तो वह मान लेता है कि हमारा पूरा पावना वसूल हो गया । दक्षिण अफ्रीका के वड़े व्यापारी आमतोरसे ६ फीसदी नही, बल्कि २५ फीसदी नफा लिया करते हैं । अत. उन्हें रुपयेमे वारह आने मिल जाए तो वे इसे घाटेका रोजगार नही मानते । पर दिवालेमे पूरा-पूरा पावना तो शायद ही मिलता है। इसलिए कोई भी पावनेदार कर्जदारको दिवालिया बनवाना नहीं चाहता। अत. काछलियाके दिवालेसे गोरे व्यापारियोका दूसरोको धमकाना तो बंद हो ही जाना चाहिए था। हुआ भी यही । गोरोका मतलब यह था कि काछलियाको दवाकर युद्धसे अलग करा दे मौर वह ऐसा न करे तो अपना सौ फीसदी पावना उनसे वसूल करे। दोमेसे एक भी उद्देश्य सिद्ध न हुआ, उलटा प्रतिकूल परिणाम हुआ । प्रतिष्ठित भारतीय व्यापारी- के दिवालियेपनका स्वागत करनेका यह पहला उदाहरण देखकर गोरे व्यापारी हतबुद्धि हो गये और सदाके लिए शांत हो गये। एक सालके अंदर सेठ काछलियाके मालसे गोरोका पावना पूरा-पूरा, शत-प्रतिशत वसूल हो गया । दिवालेमें
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