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पृष्ठ:Gandhi - Dakshin Afrika Ke Satyagraha (Hindi).pdf/२६५

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२५८ दक्षिण अफ्रीकाका सत्याग्रह किस विशेषणका व्यवहार हो सकता है, यह में नही जानता । मुझे यह तो स्वीकार करना ही होगा कि उनकी वृत्तिमें एक प्रकारकी दार्शनिकता है। जिस वक्त उनके साथ मेरा पत्र-व्यवहार हो रहा था और अखवारोमे मेरे लेख निकल रहे थे उस वक्त तो मुझे याद है कि मैने उन्हें निष्ठुर ही माना था। पर यह युद्धका अभी पहला भाग, उसका दूसरा ही वरस, था और हमारी लड़ाई तो आठ वरस चली। इस बीच में उनसे कितनी ही बार मिला । हमारी पीछेकी वात-चीतसे मुझे अकसर ऐसा लगता कि जनरल स्मट्सके काडयापनके बारेमे जो आम खयाल दक्षिण अफ्रीकामे है उसमे परिवर्तन होना चाहिए। दो बाते तो मुझे साफ दिखाई दी. अपनी राज- नीतिके विपयमें उन्होंने कुछ सिद्धांत स्थिर कर रखे है और वे नितान्त अनीतिमय तो नही ही है, पर इसके साथ-साथ मैने यह भी देखा कि उनके राजनीतिशास्त्रमे चालाकी और मौका पडनेपर सत्याभासो लिए भी स्थान है ।"

२ :

युद्धकी पुनरावृत्ति एक ओर जनरल स्मट्ससे समझोते की शर्तोंका पालन करनेके लिए विनती की जा रही थी तो दूसरी ओर कौमको फिरसे जगानेका उद्योग उत्साहपूर्वक चल रहा था। अनुभव यह हुआ कि हर जगह लडाई फिर शुरू करने और जेल जानेको लोग तैयार थे। हर जगह सभाएं की जाने लगी, जिनमें ये पक्तिया चपते समय हमें यह मालूम हो गया है कि जनरल स्मट्सको सरदारीका भी अंत हो सकता है । मो० क० गाधी