युद्धकी पुनरावृत्ति २५६ सरकारके साथ हमारा जो पत्र-व्यवहार चल रहा था वह समझाया जाता । 'इंडियन ओपीनियन में तो हर हफ्तेका रोजनामचा दिया हो जाता था। इससे कीमको स्थितिकी परी जानकारी रहती । सबको समझा दिया गया कि हमारा अपनी खुशीसे परवाने लेना निष्फल सिद्ध होनेवाला है और खूनी कानून किसी तरह रद न हुआ तो हमे अपने परवाने जला डालने होगे । इससे स्थानीय सरकारको यह मालूम हो जायगा कि हिंदुस्तानी अडिग है, निर्भय है और जेल जाने- को भी तैयार है। इस दृष्टिसे हर जगह परवाने भी इकट्ठा किये जा रहे थे । जिस विलके बारेमे हम पिछले प्रकरणमें पढ चुके है सरकारकी ओरसे उसको पास करानेकी तैयारी होने लगी । द्वासवालकी धारा सभाका अधिवेशन आरभ हुबा । भारतीयाने उसमे आवेदनपत्र भेजा, पर इसका भी नतीजा कुछ न निकला । अतमे सत्याग्रहियोका 'अल्टिमेटम' सरकारके पास भेजा गया । 'अल्टिमेटम' के माती होते. 'विश्वपन' या धमकीका पत्र जो लड़ाईके इरादेसे ही भेजा जाता है । इस शब्दका व्यवहार कौमकी ओरसे नहीं किया गया, बल्कि उसके निश्चयकी सूचना देनेवाला जो पत्र सरकारको भेजा गया उसको जनरल स्मट्सने धारा सभामे यही नाम दिया और साथ-साथ यह भी कहा कि जो लोग ऐसी धमकी इस सरकारको दे रहे है उनको उसके वलका पता नहीं है। मुझे खेद इतना ही है कि कुछ आंदोलनकारी (एजिटेटर) गरीव हिदुस्तानियोंको उकसा रहे हैं और गरीब लोगोमे उनका जोर हुआ तो वे बरबाद हो जायगे । अखवारोंके संवाददाताओं- ने इस प्रसगका वर्णन करते हुए लिखा था कि धारा समाके बहुसख्यक सदस्य अल्टिमेटमकी बात सुनकर बाग- बबूला हो गये । उनकी आखे सुखं हो गई और उन्होने
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