युद्धकी पुनरावृति 1 २६१ ऊपरके जैसा पत्र लिखनेका पर्याप्त कारण था । कीमके सामने दो स्थितिया थी. एक तो यह कि जगलीपनका आरोप स्वीकार कर दवी पडी रहे। दूसरी यह कि उक्त आरोपसे इन्कार करनेके अमली कदम उठाये। ऐसे कदमोंमें यह पत्र पहला थां । इस पत्रके पीछे उसपर अमल करनेका दृढ निश्चय न होता तो यह पत्र उद्धत समझा जाता और हिदुस्तानी विचाररहित और उजड़ कौम है, यह साबित होता । पाठकों के मनमें शायद यह शंका पैदा हो कि जगली होने- से इन्कार करनेका कदम तो १९०६मे, जव सत्याग्रहकी प्रतिज्ञा की गई उसी वक्त उठाया जा चुका था और यदि यह सही हो तो इस पत्रमे ऐसी कौन-सी नई बात थी जिससे में उसको महत्व देता हू और यह मानता हू कि उसके लिखे जानेके 'वक्तसे कोमने जंगलीपनके आरोपको अस्वीकार करना आरंभ किया ? एक दृष्टिसे यह दलील सही मानी जा सकती है, पर विशेष विचारसे मालूम होगा कि अस्वीकारका सच्चा आरंभ निश्चय- पत्रसे ही हुआ। पाठकोको याद रखना चाहिए कि सत्याग्रहकी प्रतिज्ञाका संयोग अनायास बना । उसके बादकी जेल आदि तो उसका अनिवार्य परिणाम ही था । उसमें कौमकी प्रतिष्ठा बढ़ी, पर अनजानमे । यह पत्र लिखे जानेके समय तो पूरा ज्ञान और प्रतिष्ठाका दावा करनेका पूरा इरादा था। खूनी कानूनको रद करनेका उद्देश्य तो था ही, जैसे पहले वैसे अब । पर उसके साथ भापाकी शैली, काम करनेके ढंगके चुनाव आदिमे फर्क था । गुलाम मालिकको सलाम करे और एक मित्र दूसरे मित्रको करे तो दोनों सलाम तो है ही, पर दोनोमे इतना वडा अंतर है कि उससे तटस्थ प्रेक्षक तुरंत जान जायगा कि एक गुलाम और दूसरा दोस्त है । अल्टिमेटम भेजते समय हम लोगोमे यह चर्चा भी हुई थी कि अवधि नियत करके जवाव मंगाना क्या अविनय न माना
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