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पृष्ठ:Gandhi - Dakshin Afrika Ke Satyagraha (Hindi).pdf/२७

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२० दक्षिण winter सत्याग्रह होता है । नगरों आदिके यूरोपियनोके रखे हुए नाम जो मैने दिये है उनके काव्यमय हवशी नाम भी है हो; पर वे मुझे याद नही रहे । इससे उन्हे नही दे सका । पादरियो के मतानुसार तो हवशियोका न कोई धर्म था और न है, पर धर्मको व्यापक अर्थमे ले तो कह सकते है कि वे एक ऐसी अलौकिक शक्तिको अवश्य मानते और पूजते है, जिसे वे खुद पहचान नही सकते । इस शक्तिस वे डरते भी है। शरीरके नाशके साथ मनुष्यका भर्वथा नाश नही होता, इसकी भी उन्हें बुधली प्रतीति होती है । हम नीतिको धर्मका आधार माने तो नीतिपालक होनेके कारण उन्हे वर्म- निष्ठ भी मान सकते है। सच और झूठके भेदको वे पूरी तरह समझते हैं। अपनी स्वाभाविक मवस्थामे वे जिस सीमातक सत्यका पालन करते है, गोरे या हम लोग उस सीमातक उसका पालन करते है या नही, इसमें शक है। उनके मदिर-देवालय नही होते । दूसरी जातियो की तरह इन लोगोमे भी बहुत तरहके वहम देखने में आते है । पाठकोको यह जानकर अचरज होगा कि शरीर-वलमे दुनियाकी किसी भी जातिसे हेठी न ठहरनेवाली यह कौम वस्तुत इतनी डरपोक, इतनी बुजदिल है कि हबशी जवान गोरे बालकको भी देखकर डर जाता है । कोई उसके सामने तमचा तान दे तो वह या तो भाग जायगा या ऐसे जड़ बन जायगा कि उसमे भागनेकी शक्ति भी न रहेगी। इसका कारण तो है ही । उसके दिलमे यह बात बैठ गई है कि मुट्ठीभर गोरोने जो ऐसी बडी और जगली जाति- को वशमे कर रखा है यह जरूर कोई जादू होना चाहिए । भाले और तीरसे काम लेना हवशी बहुत अच्छी तरह जानते थे । ये तो उनसे छीन लिए गए है। बंदूक उन्होने न कभी देखी, न चलाई। जिसको न दियासलाई दिखानी पड़ती है, न एक उगली हिलानेके सिवा और कोई हरकत 1