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पृष्ठ:Gandhi - Dakshin Afrika Ke Satyagraha (Hindi).pdf/२७२

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ऐच्छिक परवानोंकी होली २६५ ले तो कोई उनका हाथ पकड़नेवाला नहीं। जिसका ऐसा कुकर्म करनेका इरादा हो या जिसे परीक्षाके समय अपनी शक्तिके विपयमे का हो उसके लिए अब भी वक्त है कि अपना परवाना वापस ले ले और वह ले सकता है। इस वक्त अपना परवाना लौटा लेनेवालेके लिए लज्जाका कोई कारण नही । में तो इसको एक तरहकी हिम्मत ही मानूगा पर पीछेसे परवानेकी नकल लेनेमे गर्म और जिल्लत है और कौमकी हानि है । इसके सिवा कौमको यह भी समझ रखना चाहिए कि यह लडाई लवी हो सकती है। हमे यह भी मालूम है कि हमारे कुछ साथी निश्चयसे गिर गये है । मत स्पष्ट है कि कोमकी गाड़ी खीचनेवाले जो वाकी रह गये है उन्हें उतना जोर और लगाना होगा। मेरी सलाह है कि इन सारी बातों- को सोच-समझकर ही आप मानेका साहस करें ।" मेरे भाषणके वीचमे ही ये आवाजे तो आ ही रही थी "हमे परवाने वापस नही लेते हैं, उनकी होली जलाइये ।" अतमे मैनें कहा कि किसीको प्रस्तावका विरोध करना हो तो वह खड़ा हो जाय । पर कोई खड़ा न हुआ । इस सभामें मीर आलम भी हाजिर था। उसने जाहिर किया कि मुझको मारकर उसने मूल की और अपना असल परवाना जलानेके लिए दिया । ऐच्छिक परवाना तो उसने लिया ही नही था । मैंने मीर आलमका हाथ पकड़ा और हपसे दवाया । मैने फिर उसे जताया कि मेरे मनमे तुम्हारे प्रति कभी कोई रोष नहीं था। मोर आलमके इस कामसे समा हर्षका ठिकाना न रहा । कमेटीके पास दो हजारसे ऊपर परवाने जलानेके लिए आ चुके थे। उनकी गठरी उपर्युक्त कढाईमे झोंककर ऊपरसे मिट्टीका तेल उंडेल दिया गया और ईसप मियांने उसे दिया- सलाई लगा दी। सारी सभा खड़ी हो गई और यह होली जबतक जलती रही तबतक तालियोसे मैदानको युजा रखा। कुछ