२६६ दक्षिण अफ्रीकाका सत्याग्रह लोगोने अपने परवाने अभीतक अपने पास ही रख छोडे थे। वे मचपर उनकी वर्षा करने लगे। कढाईने उनको भी आहुति कर दी गई । होली जलनेसे पहले तक वे क्यों नहीं दिये गए, यह पूछनेपर किसीने जवाब दिया कि हमारा ख्याल था कि होली जलते समय देने अधिक शोभा है और दूसरोपर उसका असर भी अधिक होगा। दूसरे कितनोने सरल भावसे स्वीकार किया कि हमारी हिम्मत न होती थी और अतिम क्षणतक यह भी सोचते थे कि शायद परवाने न जलाये जायें । पर यह होली देखकर हमसे रहा न गया। जो गति सबकी होगी वह हमारी भी हो जायगी। इस लडाईमे ऐसी सरल हृदयताके अनुभव हमें अनेक हुए । लदनके 'डेली मेल' अखवारके जोहान्सवर्गके सवाददाताने उक्त पत्रको इस सभाका विवरण भेजा उसमे परवानोकी होली जलानेकी तुलना उस घटना के साथ की गई जब अमरीकाके अग्रेजोंने विलायतसे भेजी चायकी पेटियोको वोस्टन बंदरगाहमे जलसमाधि दे दी और इंग्लैंडके अधीन न रहने निश्चयी घोषणा की। दक्षिण अफ्रीकामे १३००० हिंदुस्तानियो के असहाय समुदायका द्वासवालके वलवान राज्यसे सामना था । उधर अमरीकामे बहाके हर बात मे कुशल लाखो गोरे ब्रिटिश साम्राज्य के बलका सामना कर रहे थे। इन दोनों स्थितियोंकी तुलना करके देखनेपर 'डेलीमेल' के सवाद- दाताने भारतीयोके विषयमे अतिशयोक्ति की, ऐसा नही जान पडता। हिंदुस्तानी कोमका हथियार अपने सत्यपर विश्वास और भगवानके मरोनेके सिवा और कुछ न था । इसमें सदेह नही कि श्रद्धालुके लिए यह शस्त्र सर्वोपरि है। पर जन- समाजमे अभी यह दृष्टि नहीं आई थी और जबतक वह नही आती aane freत्ये १३ हजार हिदुस्तानी हर हथियारसे लैस अमरीकाके गोरोके सामने तुच्छ ही गिने जाएगे, पुर
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