सोराबजी शापुरची अडाजनिया २७३ तय किया था कि चाहे जिस भारतीयके जरिये यह परीक्षा नही कराई जायगी । खयाल यह था कि ऐसे आदमीको ट्रांस- वालमे दाखिल कराके जेल महलमे बैठा दें जो नई वस्तीके कानूनकी उन दूसरी शर्तोंको पूरा करता हो जिनसे हमारा कुछ भी विरोध नही है। इससे हमे यह साबित करना था कि सत्याग्रह मर्यादा -धर्म है । इस कानूनमे एक दफा इस आशयकी थी कि नये आनेवालेको यूरोपकी किसी एक भाषाका ज्ञान होना ही चाहिए। इसलिए कमेटीने अग्रेजी जाननेवाले ऐसे हिदुस्तानीको दाखिल करानेकी बात सोची थी जो ट्रांसवालमे पहले रह चुका हो। कितने ही नौजवानोने इस परीक्षाके लिए अपने आपको पेश किया । पर उनमेंसे सोराबजी शापुरजी महाजनियाका नाम, बतौर कसौटीके स्वीकार किया गया । हिंदुस्तानी नामसे ही पाठक समझ लेंगे कि सोराबजी पारसी थे । सारे दक्षिण अफ्रीकामे पारसियोंकी संख्या सो से ऊपर नही होगी। पारसियोंके बारेमे जो मत मैने हिंदुस्तानमे प्रकट किया है, दक्षिण अफ्रीकाने भी मेरा वही मत था । सारी दुनियामे कुल मिलाकर एक लाखसे अधिक पारसी न होंगे। इतनी छोटी- सी जाति अपनी प्रतिष्ठाकी रक्षा कर रही है । अपने धर्मपर दृढ़ता से आरूढ है और दानशीलतामें दुनियाकी कोई भी कौम उसकी बराबरी नही कर सकती। इतनी ही बात इस जातिकी उत्तमताका प्रमाणपत्र है । उनमें भी सोरावजी तो काम पड़ने- पर रत्न निकले। जब वह लड़ाई में शामिल हुए उस वक्त मैं उनको कुछ यों ही मामूली-सा जानता था । लड़ाईमे शामिल होने के विपयमें उन्होने जो पत्र लिखे थे उन्होंने मुझपर अच्छा असर डाला था। में जैसे पारसियोंके गुणोंका पुजारी हूं वैसे ही जातिरूपमे उनमें जो अनेक खामियां है उनसे भी अनजान नही था और न हू । इसलिए सच्ची परीक्षाका अवसर आनेपर १५ 1
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