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पृष्ठ:Gandhi - Dakshin Afrika Ke Satyagraha (Hindi).pdf/२८३

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२७६ दक्षिण अफ्रीकाका सत्याग्रह मैं इनमें चुनाव कर ही नही सकता। दोनो अपने-अपने क्षेत्रमें वेजोड थे। जैसे काछलिया जितने शुद्ध मुसलमान थे उतने ही शुद्ध भारतीय थे, वैसे ही सोराबजी भी जितने सच्चे पारसी थे उतने ही सच्चे हिदुस्तानी थे। यही सोराबजी सरकारको पहलेसे नोटिस देकर आज- माइशके लिए ट्रांसवालमे दाखिल हुए। सरकार इस कदमके लिए विलकुल तैयार न थी । इससे सोराबजीके साथ क्या कार्रवाई की जाय इसका तुरत निश्चय न कर सकी। सोराब- जीने खुले तौरपर सरहृद लाघी और ट्रासवालमें दाखिल हुए। सरहदपर परवानोकी जांच करनेवाला अफसर उन्हें जानता था । सोरावजीने उससे कहा, "मैं ट्रांसवाल में जान-बूझकर अपने अधिकारकी परीक्षाके लिए प्रवेश कर रहा हू । तुम्हे मेरी अग्रेजीकी परीक्षा लेनी हो तो लो और गिरफ्तार करना हो तो कर लो ।” अधिकारीने जवाब दिया- "मुझे मालूम है कि आप अग्रेजी जानते है, इसलिए यह परीक्षा मुझे लेनेकी जरूरत ही नहीं । आपको गिरफ्तार करनेका मुझे हुक्म नही। इसलिए आप खुशीसे जाए। जहां जायगे वहा सरकारको आपको गिरफ्तार करना होगा तो करेगी ।" इस प्रकार अनसोची रीतिसे सोराबजी जोहान्सबर्ग तक पहुंच गये । हम सबने उनका हर्षके साथ स्वागत किया । किसीको यह आशा नही थी कि सरकार द्वासवालके सरहदी स्टेशन वोक्सरेस्टसे उनको एक कदम भी आगे न बढने देगी। अकसर ऐसा होता है कि जब हम अपना कदम सोच-समझ- कर और निर्भय होकर तुरत उठाते हैं तो सरकार उसका सामना करनेको तैयार नही होती । हरएक सरकारका यह स्वभाव माना जा सकता है । सामान्य आदोलनोमें सरकारका कोई भी अधिकारी अपने महकमेको इतना अपना नही लेता कि हर मामलेमे पहलेसे विचार स्थिर और व्यवस्थित कर