२७८ दक्षिण अफ्रीकाका सत्याग्रह सामान्य ज्ञान है और स्थानीय अधिकारी इसकी परीक्षा लेना चाहे तो देने को तैयार हू । इस पत्रका उन्हें कोई जबाव न मिला था। कुछ दिन बाद उसका जवाब समनके रूपये मिला । अदालतमे मुकदमा चला । १९०८ की ८ वी जुलाईको उसकी सुनवाई हुई । अदालतका कमरा भारतीय दर्शकोसे भर गया था। मुकदमा शुरू होने के पहले अदालतके अहाते मे उपस्थित भारतीयोको इकट्ठा करके तात्कालिक सभा की गई । सोराबजीने उसमे जोशीला भाषण दिया । उसमे यह प्रतिज्ञा की कि जबतक हमारी विजय न हो तबतक जितनी वार बेल जाना पड़े उतनी वार जानेको तैयार रहूगा और चाहे जो संकट आये उसे सहन करूंगा । यह अरसा इतना लवा था कि इस बीच मैने सोरावजीको अच्छी तरह पहचान लिया था और समझ गया था कि वह अवश्य सच्चे रत्न निकलेंगे। मुकदमा पेश हुआ । मै वकीलको हैसियतसे खडा हुआ । समनमे कई दोष थे । उन दोपोके कारण मैने सोराबजीके विरुद्ध निकाले हुए समनको रद कर देनेकी माग की। सरकारी वकीलने जवाबमे दलील पेश की; पर अदालतने अगले दिन मेरी दलीलको मान कर समन रद कर दिया और सोरावजीको रिहा कर दिया। कौम खुशी से पागल हो गई और कह सकते हैं कि उसके पागल हो जानेका कारण भी था। दूसरा समन निकाल कर फौरन ही सोरावजी पर पुनः मुकदमा चलानेको हिम्मत तो सरकार- को किस तरह हो सकती थी ? और हवा भी यही । इसलिए सोराबजी सार्वजनिक कामोमे लग गये । पर यह छुटकारा सदाके लिए नही था । सोराबजीको तुरंत चेतावनी मिली कि १० जुलाईको फिर अदालत में हाजिर हो। उस दिन मजिस्ट्रेटने उन्हें सात दिनके बंदर ट्रासवाल छोड देनेका हुक्म दिया । अदालतका हुक्म तामील हो जाने के वाद सोराबजीने पुलिस सुपरिटेंडेंट मि० बरतोनको सूचना दी कि
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