५० दक्षिण अफ्रीकाका सत्याग्रह तवतक वह थकता ही नही । इसलिए कीम सरकारकी धारणाको गलत सावित कर देनेमे समर्थ थी । नेटालमे अनेक ऐसे हिंदुस्तानी बसते थे जिन्हें ट्रासवालमें बसनेका पुराना हक था। उन्हें व्यापारके लिए ट्रांसवालमें दाखिल होनेकी आवश्यकता नही थी। पर कौम मानती थी कि उन्हें यहां आनेका हक है। फिर वे थोडी वहुत अंग्रेजी तो जानते ही थे। इसके सिवा सोराबजी जितनी शिक्षा पाये हुए भारतीयोके प्रवेशसे तो सत्याग्रहके नियमका किसी तरह भग होता ही नही था । अतः हमने दो तरह के हिदुस्तानियोंको दाखिल करनेका निश्चय किया एक तो वे जो पहले ट्रासबालमें रह चूके थे, दूसरे वे जिन्होने खास तौरसे अंग्रेजी पढी हो, यानी जो शिक्षित कहे जाते हो । इनमें सेठ दाऊद मुहम्मद और पारसी रुस्तमजी ये दो बड़े व्यापारियोमसे थे और सुरेन्द्रराय मढे, प्रागजी खंडभाई देसाई, हरिलाल गाधी, रतनशी सोढा आदि शिक्षित जनोसे थे । सेठ दाऊद मुहम्मदका परिचय पाठकोंको करा दूं। ये नेटाल sfsar काग्रेसके अध्यक्ष थे और उन भारतीय व्यापारियोंमेंसे थे जो सबसे पहले दक्षिण अफ्रीका में पहुंचे थे। वह सूरतके सुन्नी जमातके वोहरा थे । दक्षिण अफ्रीकामे मुझे ऐसे थोड़े ही हिंदू- स्तानी मिले जो चतुराईमे उनकी बराबरी कर सकें। उनकी समझने की शक्ति बहुत अच्छी थी । अक्षरज्ञान थोडा ही था, पर अभ्याससे अग्रेजी और डच अच्छी वोल लेते थे । यूरोपियन व्यापारियोंके साथ अपना काम मजेसे चला लेते थे । उनकी दानशीलता विख्यात थी । उनके यहा नित्य कोई ५० मेहमानो- का खाना तो होता ही था, कोमो चन्दोमें उनका नाम मुखियाओं- मे होता । उनके एक बेटा था जो अमूल्य रत्न था। वह चारित्र्य- मे वापसे बहुत बढा-चढा था । उसका हृदय स्फटिक मणिके समान था । इस वेटेके चारित्र्य वेगको दाऊद सेठने कभी रोका
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