२८२ दक्षिण फ्रीकाका सत्याग्रह मजिस्ट्रेटने उन्हें सात दिनके अदर ट्रांसवालकी सरहद से बाहर हो जानेका हुक्म दिया । उन्होंने आज्ञाका उल्लंघन किया मौर २८ अगस्तको प्रिटोरियामें फिर गिरफ्तार किये गये और बिना मुकदमा चलाये ही देशसे निकाल दिये गये । ३१ तारीखको वे फिर ट्रासवालकी सीमामे दाखिल हुए और अंतमे ८ सितंबर को वोक्रस्टमें उन्हे ५० पौंडके जुर्माने या तीन महीने की कही कंदकी सजा सुनाई गई। कहने की आवश्यकता नही कि उन्होने खुशीसे जेल जाना पसंद किया। कौमका जोग वहा । ट्रमिवालके भारतीय नेटालसे उनकी मददको आये हुए अपने भाइयोको छुड़ा न सके तो जेलमें उनका साथ तो उन्हें देना ही चाहिए । इस विचारसे ट्रासबालके भारतीय भी जेलकी राह ढूंढने लगे । उनकी गिरफ्तारीफे कितने ही रास्ते थे । ट्रासवालमे बसनेवाला हिंदुस्तानी परवाना न दिखाये तो उसे व्यापारका परवाना न मिलेगा और परवानेके विना व्यापार करे तो अपराधी माना जाता । नेटालसे ट्रांसवालकी सरहदमे दाखिल होना हो तो भी परवाना दिखाना जरूरी था । न दिखानेवाला गिरफ्तार कर लिया जाता । परवाने तो जला डाले गये थे, इसलिए रास्ता साफ था। दोनो रास्ते पकडे गये ! कुछ लोग बिना परवाना दिखाये फेरी करने लगे और कुछ ट्रांसवालकी सरहदमें दाखिल होते समय परवाना न दिखाकर गिरफ्तार होने लगे । अब युद्धका रंग जमा । सवकी परीक्षा होने लगी, नेटालसे और भारतीय आये । जोहान्सबर्ग में भी घर पकड शुरू हुई । स्थिति यह हो गई कि जो चाहे वह गिरफ्तार हो सकता था । जेलखाने भरे जाने लगे । नेटालसे आये हुए आक्रमणकारियोको तीन-तीन महीनेकी सजा मिली, ट्रांसवालके फेरीवालोको चार दिनसे लगाकर तीन महीनेतककी । 1 जो लोग इस तरह गिरफ्तार हुए उनमें हमारे इमाम
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