२२ after where सत्याग्रह पृथ्वीके उदरमं ही पड़े रह जाय। वैसे ही इनपर कर लगाये बिना यूरोपियनोको नोकर मिलना भी कठिन होगा। इसका फल यह हुआ है कि खानो के भीतर काम करनेवाले हजारों हनियों को दूसरे रोगोके साथ-साथ एक प्रकारका क्षय रोग भी हो जाता है जिसे 'माइमसे थाइसिस' (खानमे काम करनेवालो का क्षय ) कहते है । यह रोग प्राणहारी है। इसके पयेमे पडनेके वाद विरले ही उब- रते हैं । ऐसे हजारो आदमी एक खानके अदर रहे और उनके वालयच्ते साथ न हो तो उस दशामे ये कितना सयम रख सकते हैं, पाठक इसका सहज ही अनुमान कर सकते है । इसके फस्वरूप पैदा होनेवाले रोगोके भी ये लोग शिकार हो जाते है । दक्षिण अफ्रीका विचारशील गोरे भी इस गंभीर प्रश्नपर विचार न करते हो, सो वात नहीं है । उनमेसे कितने ही अवश्य यह मानते हैं कि सभ्यताका असर इस जातिपर कुल मिलाकर अच्छा पडा है, यह दावा शायद ही किया जा सकता है । इसका बुरा असर तो हर आदमी देख सकता है । इस महान देशमे जहा ऐसी सरल, निर्दोष जाति बसती थी, कोई चार सौ साल पहले बलदा लोगोने पडाव डाला । ये गुलाम तो रखते ही थे, अपने जावाके उपनिवेशसे कितने ही बलंदा अपने मलायी गुलामोको लेकर उस प्रदेशमे दाखिल हुए जिसे आज हम केप कालोनी कहते है । ये मलामी लोग मुसलमान है। उनमे बलदा लोगो का रक्त और वैसे ही उनके कितने ही गुण भी है। वे सारे दक्षिण अफ्रीका में इक्के-दुक्के बिखरे हुए दिखाई देते है, पर उनका केन्द्र केप टाउन ही माना जाता है। आज उनमेंसे कितने ही गोरोकी नौकरी करते है और दूसरे स्वतंत्र व्यवसाय करते है । मलायी स्त्रिया ast ही मेहनती और होशियार होती है । उनकी रहन-सहन बाम तोरसे साफ-सुथरी दिखाई देती है । औरते बुलाई और सिलाई-
पृष्ठ:Gandhi - Dakshin Afrika Ke Satyagraha (Hindi).pdf/२९
दिखावट