1 २६६ दक्षिण अफ्रीकाका सत्याग्रह । अत. स्थानीय सरकारको हिदुस्तानियो को हैरान करनेकी नई तरकीव सोचनी पड़ी । जेलोमें जगह रह नहीं गई थी । सरकारने सोचा कि हिंदुस्तानियोको अगर हिंदुस्तानतक पहुचा सके तो वे जरूर डरकर हमारी धरण आयेंगे। इसमे कुछ सचाई जरूर थी । इस प्रकार एक बड़े जत्थेको सरकारने हिंदुस्तान भेजा । इन निर्वासितको बहुत कष्ट सहने पडे । खाने-पीने को भी जो सरकार दे वही मिलता, यानी भारी कप्ट था । सब डेकमे ही भेजे गए, फिर इस तरह निर्वा- सित होनेवालोंके पास अपनी जमीन होती, दूसरी मिल्कियत होती । अपना घषा-रोजगार होता, अपने आश्रित बाल- बच्चे होते, कुलके सिरपर कर्ज भी होता । शक्ति होते यह सब गंवाने, दिवालिया बनने को तैयार होनेवाले लोग अधिक नही हो सकते थे । यह सब होते हुए भी बहुतसे भारतीय अपने निश्चयपर अटल रहे। बहुतेरे ढीले भी पड गये, पर उन्होने इतना ही किया कि अपने आपको जान-बूझकर गिरफ्तार नहीं कराया । उनमेसे अधिकांश इतनी कमजोरी नही दिखाई कि जलाए हुए परवानोको फिरसे निकलवा से; पर कुछने डरकर फिरसे परवाने ले लिए । फिर भी जो लोग दृढ रहे उनकी संख्या नगण्य नही थी ! उनकी बहादुरीकी हद न थी । मेरा विश्वास है कि उनमें कितने ही ऐसे थे जो हँसते-हंसते फासी के तख्तेपर चढ जाते । माल-जायदादकी चिता तो उन्होने छोड ही दी थी; पर जो हिंदुस्तान भेज दिये गये उनमें बहुतेरे गरीब और सीधे-सादे आदमी थे । वे केवल विश्वासके वलपर ही लडाईमें शामिल हुए थे। उनपर इतना जुल्म होना असा लगा। उनकी मदद भी कैसे की जाय, यह समझना कठिन था । पैसा तो अपने पास थोड़ा ही था । ऐसी लडाईमे पैसेकी मदद देने
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