देशनिकाला २५७ जाय तो लढाई ही हार जाय । उसमे लालची आदमी न घुस आएं, इस डरसे पैसेका लालच एक भी आदमीको नही दिया जाता था। हां, सहानुभूतिकी सहायता देना हमारा धर्म था। अनुभबसे मैने देखा है कि सहानुभूति, मीठी निगाह और मीठे बोल जो काम कर सकते है वह पैससे नही हो सकता । पैसेका लोभी भी अगर उसको हमदर्दी न मिले तो अतमें वह उसे त्याग देता है । इसके विपरीत जो प्रेमसे वश हुआ है वह अनेक संकट सह लेनेके लिए तैयार रहता है। अत हमने निश्चय किया कि इन निर्वासित भाइयोंके लिए हमदर्दी जो कुछ कर सकती है वह किया जाय । उन्हे आश्वासन दिया कि हिंदुस्तानमे आप लोगोंके लिए यथोचित प्रवध किया जायगा । पाठकोको जान लेना चाहिए कि इन लोगोंमेंसे बहुतेरे तो गिरमिट मुक्त थे। हिंदुस्तान में उनका कोई सगा - सबधी न मिलता। कुछ तो दक्षिण अफ्रीकामे ही जन्मे भी थे। सबके लिए हिदुस्तान परदेश-सा तो हो ही गया था। ऐसे निराधार जनोंको समुद्र के किनारे उतारकर भटकने- को छोड़ देना तो क्रूरता ही मानी जायगी। इसलिए उन्हें इतमीनान दिलाया गया कि हिदुस्तानमे उनके लिए सब आवश्यक प्रबंध कर दिया जायगा । यह सब करते हुए भी जवतक उनके साथ कोई मददगार न हो तबतक उनको शांति नही मिल सकती थी । देशनिकाला पानेवालोंका यह पहला ही जत्था था । स्टीमर छूटनेके कुछ ही घटे वाकी रह गये थे। चुनाव के लिए वक्त न था । साथियों- मेसे भाई पी० के० नायडपर मेरी नजर गई। मैने पूछा- "इन गरीब भाइयोंको पहुंचाने हिदुस्तान जा सकते हो ?" "क्यों नही ?" "पर स्टीमर तो छूटने ही वाला है ।"
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