६२ दक्षिण अफ्रीकाका सत्याग्रह करनेवाले ऐसे आदमी नही थे जो छिपे तौरपर कुछ खा-पी लेते हों । पाठकोको जान लेना चाहिए कि ऐसे मामलेमे यहा हिंदुस्तानमें जो बांदोलन हो सकता है ट्रासबालमे उसके लिए अधिक अवकाr नही था। वहांके जेल नियम भी अधिक कडे थे। ऐसे समय में भी कैदियोको देखने जानेका वहा रिवाज नही था । सत्याग्रही जब जेकमे पहुच गया तब आमतौरसे उसे अपनी फिक्र खुद करनी पड़ती। यह लडाई गरीबोकी थी और गरीबोंके तरीकेसे चलाई जा रही थी । अत ऐसी प्रतिज्ञा- को जोखिम बहुत कड़ी थी, फिर भी ये सत्याग्रही दृढ रहे । उस वक्तका उनका कार्य आजकी तुलना अधिक स्तुत्य गिना जायगा क्योकि उस समय अनशनकी आदत लोगोको नही पड़ी थी। पर वे सत्याग्रही अडिग रहे और उनकी जीत हुई । सात दिन के उपवासके बाद उन्हें दूसरी जेल भेजनेका हुक्म आ गया। फिर शिष्ट-मंडल इस प्रकार सत्याग्रहियोको जेलमे उसने और देशनिकाला देनेका चत्र चल रहा था । इसमे ज्वारभाटा आता रहता। दोनो "पक्ष कुछ ढीले भी हो रहे थे। सरकारने देखा कि जेलोको भरने- से पक्के सत्याग्रही हारनेवाले नही । देशनिकालेसे उसकी बदनामी होती थी। मामले अदालतमे पहुचते तो उनम उसकी हार भी होती थी। हिंदुस्तानी भी जोरदार मुकावले- के लिए तैयार नहीं थे । न इतने मत्याग्रही अब रह ही गये थे । कुछ थक गये थे, कुछने बिलकुल हिम्मत हार दी थी और अपने निञ्चयपर अटल रहनेवालोको मूर्ख समझते थे ।
पृष्ठ:Gandhi - Dakshin Afrika Ke Satyagraha (Hindi).pdf/२९९
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