फिर शिष्ट-मंडल २६३ पर ये मुखं अपने आपको वृद्धिमान मानकर भगवान् और अपनी लड़ाई तथा उसके साधनोंकी सचाईपर पूरा भरोसा रखे हुए बैठे थे। वे मानते थे कि अंतमें तो सत्यकी ही जय होती है । दक्षिण अफ्रीकाकी राजनीति तो एक क्षणके लिए भी स्थिर नही होती थी। बोवर और अग्रेज दोनों चाहते थे कि दक्षिण अफ्रीका के सव उपनिवेशोंको इकट्ठा करके और अधिक स्वतंत्रता प्राप्त करे । जनरल हर्टजोग चाहते थे कि ब्रिटेनसे विलकुल नाता टूट जाय। दूसरे लोग उससे नामका सबंध बनाए रखना पसंद करते थे । अंग्रेज संबंधका पूर्ण विच्छेद तो सहन न कर सकते थे। जो कुछ मिलता था वह ब्रिटिश पार्लमेंट के जरिये ही मिल सकता था, इसलिए बोलरों और अग्रेजोने यह से किया कि दक्षिण अफ्रीकाकी ओरसे एक शिष्ट मंडल विलायत जाय और उसका मामला ब्रिटिश मंत्रि-मंडल के सामने रखे । भारतीयोंने देखा कि चारो उपनिवेश एक हो गये, उनका 'यूनियन' (सब) वन गया तो हमारी जैसी दशा है उससे भी बुरी हो जायगी। सभी उपनिवेश सदा हिंदुस्तानियोको अधिक-से-अधिक दवाये रखना चाहते थे । यह तो स्पष्ट ही था कि ये सब भारत के द्वेपी आपसमे और ज्यादा मिल गये तो हिंदुस्तानी ओर ज्यादा दवाये जायगे । गो हिंदुस्तानियोंकी आवाज नक्कारखानेमे तृतीकी आवाज जैसी ही थी, फिर भी हमें एक भी कोशिशसे बाज न रहना चाहिए, यह सोचकर भारतीयोका एक शिष्ट-मडल फिर विलायत भेजनेका निश्चय हुआ । इस वार पोडबंदर के मेमन जेठ हाजी हवीय शिष्ट-मंडल म मेरे साथी चुने गये । इनका ट्रांसवालका कारवार बहुत पुराने जमानेसे था। अनुभव विस्तृत था । अग्रेजी पढ़ी नही थी, फिर भी अंग्रेजी, डच, जल आदि भाषाएं नासानीसे समझ लेते थे । इनकी सहानुभूति सत्याग्रहियों की ओर थी;
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