फिर शिष्टमंडल २६५ जनरल बोधाने मुझसे कहा है कि आपसे यह कह दू और आपकी जिम्मेदारीका खयाल आपको करा दूं।" यह संदेसा सुनानेके बाद लार्ड एम्प्टहिलने कहा - "देखिये, आपकी सारी व्यावहारिक मांगें तो जनरल घोषा मंजूर कर ही रहे हैं और इस दुनियामे हमे कही लेना और कही देना तो पड़ता ही है। हम जो चाहते है वह सब तो हमें मिल नहीं सकता । इसलिए आपको मेरी अपनी सलाह यही है कि आप इस प्रस्ताव- को स्वीकार कर ले। आपको सिद्धांतके लिए लड़ना हो तो आगे चलकर लड सकते हैं। आप दोनों इस वातपर विचार कर के और फिर जो मनासिव हो वह जवाब दें।" यह सुनकर मैंने सेठ हाजी हबीबकी ओर देखा । उन्होंने कहा- "मेरी तरफसे कहिये कि में समझौता पक्षकी मोरसे कहता हूं कि में जनरल वोथाका प्रस्ताव स्वीकार करता हूँ । वह इतना दे देगे तो तत्काळ हम संतोष कर लेंगे और सिद्धांत- के लिए पीछे लड लेंगे । अव कोमका और वरवाद होना मुझे पसंद नही । जिस पक्षकी ओरसे में बोल रहा हूं उसकी संख्या अधिक है और उसके पास पैसा भी अधिक है ।" मैने इन वाक्योंके अक्षर-अक्षरका उलथा कर दिया और फिर अपने सत्याग्रही पक्षकी ओरसे कहा--"आपने जो कष्ट किया उसके लिए हम दोनों आपके अहसानमंद है। मेरे साथीने जो बात कही है वह ठीक है। वह उस पक्षकी बोरसे बोले हैं जो सख्या और पैसा दोनोंमे अधिक बलवान है । जिनकी बोरसे में बोल रहा है वे पैसेमें उनसे गरीब और सख्यामें थोड़े है। पर वे सिरपर कफन बांधे हुए है। उनकी लड़ाई व्यवहार और सिद्धांत दोनोंके खातिर है। अगर दोमेंसे एकको छोडना ही पड़े तो वे व्यवहारको जाने देगे और सिद्धांतके लिए लड़ेंगे। जनरल बोथाकी शक्तिका हमे अंदाजा है, पर अपनी प्रतिज्ञाको हम उससे ज्यादा वजनदार मानते हैं, इसलिए उसका पालन
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