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पृष्ठ:Gandhi - Dakshin Afrika Ke Satyagraha (Hindi).pdf/३०४

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फिर शिष्टमंडल २६७ जाता हूं। मेरा वजन ज्यादा नही है। फिर भी जो कुछ है वह आपके लिए काम आता ही रहेगा, इस विषय में आप निश्शक रहें ।" ये प्रोत्साहनके वचन सुनकर हम दोनोंको प्रसन्नता हुई । इस प्रसगकी एक मधुर वस्तुकी और शायद पाठकोने ध्यान न दिया हो । सेठ हाजी हवीव और मुझमे, जैसा कि ऊपर बता चुका हू, मतभेद था, फिर भी हममे परस्पर इतना प्रेम और विश्वास था कि सेठ हाजी हबीबको अपना विरोधी वक्तव्य मेरे ही जरिये कहलानेमे हिचक न हुई । वह इतना विश्वास रख सकते थे कि उनका प्रश्न में लार्ड एम्प्टहिलके सामने ठीक तौरसे उपस्थित कर दूंगा। यहा पाठकौसे एक अप्रस्तुत बात भी कह दू । विलायत में रहनेके दिनोमें वहुतसे भारतीय अराजकतावादियोके साथ मेरी बातचीत हुई। उन सबकी दलीलोंका खडन करके और दक्षिण अफ्रीकाके वैसे विचारवाले लोगोंका समाधान करनेके प्रयत्नसे 'हिंदुस्वराज की उत्पत्ति हुई। उसके मुख्य तत्त्वोंकी मैने लार्ड एम्प्टहिल के साथ भी चर्चा की थी। उसमें उद्देश्य यही था कि वह जरा भी यह न सोच सके कि मैंने अपने विचारको दवाकर उनके नाम और उनकी सहायताका दक्षिण अफ्रीका कामके लिए दुरुपयोग किया। उनके साथ हुई मेरी बहस और बातचीत मुझे सदा याद रही है। उनके धरमे वीमारी होते हुए भी वह मुझसे मिले थे और यद्यपि 'हिंद- स्वराज' में प्रकट किये हुए मेरे विचारोंसे वह सहमत नही हुए, फिर भी दक्षिण अफ्रीकाकी लढाईमे उन्होने अपना हिस्सा आखिरतक पूरा अदा किया और हमारा. मधुर संबंध अंततक बना रहा।