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पृष्ठ:Gandhi - Dakshin Afrika Ke Satyagraha (Hindi).pdf/३११

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३०५ दक्षिण फ्रोकाका सत्याग्रह (Architect ) तो मि० येनवेत्र थे. हो । वह एक यूरोपियन राज ले आये। एक गजराती बढ़ई नारायणदास दमानियाने, अपनी सहायता बिना ऐसे के प्रदान की और दूसरे बढई भी धोटे या दिये । केवल मारीरिक श्रमका काम हमने अपने हाथों किया। हममेंगे जिनके अग लचीले थे उन्होने नोम कर दिया। का नया काम तो बिहारी नामके सत्यागहीने का लिया । सफाईका काम, शहर जाना और बहाने गामान लाना आदि सिंह गमान यंत्री नrasने अपने जिम्मे ले दिया | इस टुकड़ी एक थे भाई प्रशवजी दूभाई देसाई । उन्होंने अपनी जिंदगीमें कभी सर्दी-गर्मी नहीं नहीं थी। यहा तो ककड़ी गर्मी और गहरी बरसात सब सहनी थी। म स्थानमें हमारे नियामका श्रीगणेण तो खेमोमे हुआ । जव- तक मकान बने तब उन्होंने मोना पड़ा। मकान दो महीने में वने होगे। मकान सफेद लोहेकी चादरोके थे, इससे उनके बनानेमें ज्यादा यमन न लगता । हमें लकडी भी जिस-जिस नापकी दरकार भी तैयार मिल जाती थी । हमको बस इतना ही करना रहता कि नापकर उनके टुकड़े कर ले। खिडकी, दर- वाजे भी थोड़े ही बनाने थे, इनीने इतने कम समयमे इतने अधिक मकान बना लिये गये । पर इन कामो भाई प्रागजीकी पूरी मशक्कत हो गई। जेलकी तुलनामे फार्मका काम निश्चय ही कड़ा था। एक दिन तो थकावट और गर्मी से वह बेहोश हो गये; पर वह भट हार माननेवाले आदमी नहीं थे। उन्होने अपने शरीरको यहां पूरी तरह कस लिया और अतमे तो उतनी शक्ति प्राप्त कर ली थी कि मशक्कतमें सबके साथ जुट मके । ऐसे ही दूसरे भाई थे जोसफ रॉयपन । वह तो वैरिस्टर थे, पर उन्हें वैरिस्टरीका गर्व न था। बहुत कडी मेहनत उनसे