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पृष्ठ:Gandhi - Dakshin Afrika Ke Satyagraha (Hindi).pdf/३१६

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टालस्टाय फार्म-२ 30€ दूसरी कठिनाई धार्मिक शिक्षाकी थी। मुसलमानोको कुरान पढानेका लोभ तो मुझे था ही। पारसियोंको अवेस्ता पढानेकी इच्छा होती । एक खोजter लडका था । उसके पास अपने पंथकी एक छोटी-सी पोथी थी। उसके वापने वह पोथी पढानेका भार मुझपर डाल दिया था । मैने इस्लाम और पारसी धर्मकी पुस्तके इकट्ठी की हिंदू-धर्मके जो मुझे मूलतत्त्व जान पढे उन्हें मैने लिख डाला अपने ही बच्चोंके लिए या फार्मके बच्चोंके लिए, यह बात अब याद नही रही। यह चीज मेरे पास होती तो अपनी प्रगति या गतिकी नाप करनेके लिए में उसे यहा दे देता; पर ये चीजे तो कितनी हो अपनी जिदगीमे मेने फेक दी या जला डाली। इन वस्तुओंके संग्रहको आवश्यकता मुझे ज्योज्यों कम जान पड़ती गई और ज्योज्यो मेरा काम वढता गया त्यो-त्यों में इन चीजोका नाश करता गया । मुझे इसका पछतावा भी नही । इन वस्तुओका सग्रह मेरे लिए एक बोझ और बडे खर्चकी चीज हो जाता। उनके रक्षणके साघन मुझे जुटाने पडते और मेरी अपरिग्रही आत्माको यह असहा होता । पर यह शिक्षणका प्रयोग व्यर्थ नही गया । वालकोमे कभी असहिष्णुता नहीं आई। एक दूसरेके धर्म और रीति- रिवाजके प्रति उन्होने उदार भाव रखना सीखा । सगे भाइयों- की तरह हिल-मिलकर रहना सीखा। एक-दूसरेकी सेवा करना सीखा। सभ्यता सीखी। उद्यमी वने गौर माज भी उन वालकोमेसे, जिनके कार्योंकी थोडी-बहुत खवर मुझको है उसपरसे में जानता हू कि टालस्टाय फार्ममे उन्होंने जो कुछ सीखा वह व्यर्थ नही गया। अधूरा सही, पर यह विचारमय और धार्मिक प्रयोग था और टाल्स्टाय फार्मके जो संस्मरण अत्यन्त मधुर है उनमे यह शिक्षणके प्रयोगका स्मरण तनिक भी कम मधुर नही है।