३१६ दक्षिण अफ्रीकाका सत्याग्रह यह मानता था कि केवल पानी, मिट्टी या उपवासके प्रयोग या भोजनके अदल-बदलसे सब प्रकारके रोग दूर किये जा सकते है । फार्ममे एक भी वीमारीके मौकेपर डाक्टरका उपयोग नही किया गया । उत्तर भारतका रहनेवाला एक सत्तर वरसका बूढा था । उसको दमे और खांसीकी शिकायत थी । वह मी महज खुराकके अदल-बदल और पानीके प्रयोगसे चगा हो गया । पर ऐसे प्रयत्न करनेकी हिम्मत अब में खो बैठा हू और खुद दो बार बीमार पड़नेके वाद यह मानने लगा हू कि मैंने इसका अधिकार भी खो दिया । फार्म जब चल रहा था उसी बीच स्व० गोखले दक्षिण अफ्रीका आये थे । उनकी यात्राके वर्णनके लिए तो अलग प्रकरणकी जरूरत है । पर उसका एक कड़वा-मीठा सस्मरण यहा लिखे देता हूं । हमारा जीवन कैसा था यह तो पाठकोने जान ही लिया । फार्ममे खाट जैसी कोई चीज नही थो; पर गोखलेजीके लिए एक भाग लाये । कोई ऐसा कमरा नहीं था जहां उनको पूरा एकात मिले । बैठनेके लिए पाठशालाकी वेचे भर थी । ऐसी स्थितिमे भी नाजुक तबियत- वाले गोखलेजीको फार्मपर लाये विना हमसे कैसे रहा जाता ? वैसे वह भी उसे देखे बिना कैसे रह सकते थे ? मेरा खयाल था कि उनका शरीर एक रातकी तकलीफ बर्दाश्त कर लेगा और वह स्टेशनसे फार्मतक डेढ मील पैदल भी आ सकते हूँ । मैंने उनसे पूछ लिया था और अपनी सरलतावश उन्होने विना सोचे-समझे मुझपर विश्वास रखकर सारी व्यवस्था स्वीकार कर ली थी। संयोगवा उसी दिन वर्षा भी हो गई । यकायक मेरे किये प्रबंधमे कोई हेरफेर नही हो सकता था । इस अज्ञानभरे प्रेमके कारण उस दिन मेने गोखलेजीको जो कष्ट दिया वह मुझे कभी नही भूला । इतना बडा परिवर्तन उनकी प्रकृति सहन नही कर सकती थी। उन्हें ठंड लग गई।
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