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पृष्ठ:Gandhi - Dakshin Afrika Ke Satyagraha (Hindi).pdf/३२७

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३२० दक्षिण अफ्रीकाका सत्याग्रह मि० केलनवेकको इच्छा हुई कि उनकी मित्रता संपादन करें। पहले तो उन्होने ऐसी पुस्तके इकट्ठी की जिनसे भिन्न-भिन्न जातिके सपकी पहचान हो सके। उनमें उन्होने देखा कि सभी साप जहरीले नहीं होते । कुछ तो खेतोकी फसलकी रक्षा करनेवाले होते हैं । हम सबने सापोको पहचानना सीख लिया और अतमे एक विशाल अजगरको, जो फार्ममे ही मिल गया या, पाल लिया । उसको सदा अपने ही हाथसे खाना देते । मैने नरमी से उनके साथ यह दलील की -- " यद्यपि आपका भाव शुद्ध है फिर भी अजगर तो उसको पहचाननेसे रहा, क्योकि आपकी प्रीति के साथ भय मिला हुआ है । उसको खुला रखकर उसके साथ खेलने की हिम्मत तो न आपकी है, न मेरी ओर ऐसी हिम्मत ही वह चीज है जिसे हम अपने अदर पैदा करना चाहते है । इसलिए इस सर्पको पालनेमे में सद्भाव तो देखता हू; पर उसमे अहिसा नही देखता । हमारा व्यवहार तो ऐसा "होना चाहिए कि अजगर उसे पहचान सके । प्राणिमान भग और प्रीतिको पहचानते है, यह तो हमारा रोजका अनुभव है । फिर इस सांपको आप जहरीला तो मानते ही नही । इसके तौर-तरीके, इसकी आदने आदि जाननेके लिए ही उसे कैद कर रखा है । यह एक प्रकारकी विलासिता हुई । मित्रनामे इसके लिए भी स्थान नही है ।" मि० केलनवेकको यह दलील जंची, पर उस अजगरको तुरत छोड देनेकी उनकी इच्छा नही हुई । मैंने किसी तरहका दबाव नही डाला । सर्पके व्यवहारमे में भी रस लेने लगा था और बच्चोको तो उसमे अतिशय आनद मिल रहा था, उनको तग करनेकी सभोको मनाही थी; पर इस केंदीने अपना रास्ता खुद निकाल लिया । पिजडेका दरवाजा दला रह गया हो या उसी ने युक्तिसे खोल लिया हो, चाहे जो कारण हो, दोबार दिनके अंदर ही एक दिन सवेरे मि० केवल नेक अपने फैदी मिश्र