, 1 H F वाल्सुटाय फार्म-३ ३२३ यह कि स्थानीय कर्मचारियो के साथ उन्होंने कैसा मधुर संबंध जोड लिया था । ये युवक उस ट्रेनको न पकड़ सके होते तो अगले दिन अदालतमे हाजिर न हो पाते। उनका कोई दूसरा जामिन नहीं था । न उनसे रुपये-पैसेकी ही जमानत ली गई थी। वे महज अपनी भलमनसीके विश्वासपर छोड़े गये थे । सत्या- ग्रहियोंकी साख इतनी हो गई थी कि उनके खुद जेल जानेसे आतुर होनेके कारण मजिस्ट्रेट उनसे जमानत लेने की जरूरत नही समझते थे। इस कारण इन युवक सत्याग्रहियोंको ट्रेन छूट जानेके खरमे भारी खेद हना था । अतः वे वायुवेगसे दौड़े। सत्याग्रहके आरभ- में अधिकारियोकी ओरसे सत्याग्रहियोको कुछ कप्ट दिये गये थे, यह बात कही जा सकती है। यह भी कह सकते है कि कही-कहीं जेलके अफसर- अहलकार बहुत ज्यादा सख्त थे, पर लड़ाई ज्यो-ज्यों आगे बढती गईं हमने कुल मिलाकर देखा कि अहलकार पहलेसे कम कडवे हो गये और कुछ तो मीठे मी हो गये मौर जहा उनके साथ लवा साबका पड़ा वहां इस स्टेशनमास्टरकी तरह हमारी मदद भी करने लगे । कोई पाठक इससे यह न सोचें कि सत्याग्रहियोने अहलकारोको किसी तरह घूस देकर उनसे सुभीते प्राप्त किये। ऐसे अयोग्य सुभीते प्राप्त करनेकी वात उन्होने कभी सोची ही नही; पर सभ्यताके सुभीते लेनेका होसला किसको न होगा ? और वैसे सुभीते सत्याग्रहियोको कितनी ही जगह मिल सकते थे। स्टेशनमास्टर प्रतिकूल हो तो नियमोकी सीमामें रहते हुए भी मुसाफिरको कितनी ही तरहसे हैरान कर सकता है। ऐसी हैरानियोंके खिलाफ आप कोई शिकायत फरियाद भी नहीं कर सकते। और वह अनुकूल हो तो कायदेके अदर रहकर भी आपको वहुतसे सुभीने दे सकता है । ऐसी सब सहूलियते हम फार्मके पासके स्टेशन लॉलेके स्टेशन- मास्टरसे पा सके थे और इसका कारण था सत्याग्रहियोका सौजन्य, उनका धेर्य और कप्ट सहन करनेकी उनकी शक्ति ।
पृष्ठ:Gandhi - Dakshin Afrika Ke Satyagraha (Hindi).pdf/३३०
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