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पृष्ठ:Gandhi - Dakshin Afrika Ke Satyagraha (Hindi).pdf/३३२

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टाल्स्टाय फार्म-३ ३२५ और भुने गेहूंका कहवा देता | नमक- ससाला विलकुल भद था। जिस मकान में सोता, उसीमे भीतरके हिस्सेमे लुटावनका भी बिस्तर लगता था । बिस्तरमे सबको दो कवल मिलते थे - एक बिछानेके लिए दूसरा ओढने के लिए । और एक काठका तकिया होता था। एक अठवारा बीता । लुटावनके शरीरमे तेज आया । दमा घटा, खासी भी घटी। पर रातमें दमा और खासी दोनों उठते । मेरा शक तबाक- पर गया । मैने उससे पूछा । लुटावनने कहा- "मैं नही पीता ।" एक-दो दिन और गये। फिर भी फर्क न पडा तो मेने छिपे तौरपर लुटावनपर निगाह रखनेका निश्चय किया। सभी जमीनपर सोते थे। सर्पादिका भय तो था ही, इसलिए मि० केलनबेकने मुझे बिजलीकी चोरवत्ती (टार्च) दे रखी थी और खुद भी एक रखते थे। इस वत्तीको में पास रखकर सोता । एक रात मैने ले किया कि विस्तरपर पडा-पडा जागता रहूगा । दरवाजेके बाहर बरामदे मेरा विस्तर था और दरवाजेके भीतर वगलमें ही छुटावनका लगा था । आधी रातको लुटावनको खांसी बाई । उसने दिया- सलाई जलाई और बीडी पीना शुरु किया । में धीरेसे जाकर उसके विस्तरके पास खड़ा हो गया और वत्तीका बटन दबा दिया । लुटावन घवराया, सब समझ गया । वीडी बुझा दी और मेरे पाव पकड़ लिए। "मैने भारी कसर किया । अव में कभी तंबाकू न पीऊगा । आपको मैने धोखा दिया । मुझको आप माफ करें ।" यह कहते-कहते लुटावनका गला भर आया । मैने उसको तसल्ली दी और कहा कि बीड़ी न पीनेमे तुम्हारा हित है । मेरे हिसाबसे खासी अवत्तक चली जानी चाहिए थी। वह नही गई, इसलिए मुझे शक हुआ । लुटावनकी वीडी गई और उसके साथ दो या तीन दिनमे खासी और वमा ढीले पड़े, और एक महीनेमें दोनों