सामग्री पर जाएँ

पृष्ठ:Gandhi - Dakshin Afrika Ke Satyagraha (Hindi).pdf/३३४

विकिस्रोत से
यह पृष्ठ अभी शोधित नहीं है।

टाल्स्टाय फार्म-३ १२७ ऊपरकी घटनाओ में वर्णित आहारके प्रयोग आरोग्यकी दृष्टिसे किये गये; पर इस फार्मके अंदर ही मेने अपने ऊपर एक अतिशय महत्त्वका प्रयोग किया, जो शुद्ध आध्यात्मिक दृष्टिसे था। निरामिषभोजीकी हैसियतसे हमें दूध लेनेका अधिकार है या नही, इस विपयपर मैंने खूब विचार किया था, खूब पढा भी था, पर फार्ममे रहने के दिनोमे कोई पुस्तक या अखबार मेरे हाथमें पढा जिसमें मैने देखा कि कलकत्तेमे गाय भैसोका दूध निचोडकर निकाल लिया जाता है । उस लेखमे फूकेकी निर्दयताभरी और भयानक क्रियाका भी वर्णन था। एक बार मि. केलनवेकके साथ दूध लेने की आवश्यकता के बारेमे वात- चीत हो रही थी। उस सिलसिलेमे मैने इस क्रियाकी बात भी कही। दूषके त्यागके दूसरे अनेक आध्यात्मिक लाभ भी मैने बताये और कहा कि दूध छोड़ा जा सकता हो तो अच्छा है। मि० केलनबेक अत्यन्त साहसी थे, इसलिए दुग्ध-त्यागके प्रयोग के लिए तुरत तैयार हो गये। उन्हें मेरी बात बहुत पसद आई। उसी दिन हम दोनोने दूध त्याग दिया और अंतमें हम केवल सूखे और ताजे फलोंपर रहने लगे। आगपर पकाई हुई हर तरह की खुराक त्याग दी। इस प्रयोगका अंत क्या हुआ, इसका इतिहास बनेका यह स्थान नही है । पर इतना तो कह ही दू कि में केवल फल खाकर पांच बरस रहा। इससे न मैने कोई कमजोरी अनुभव की और न मुझे किसी प्रकारको व्याधि हुई। इस कालमे मुझमे शारी- रिक काम करनेकी पूरी शक्ति थी, यहाँतक कि एक दिन- मे में पैदल ५५ मोलकी यात्रा कर सकता था । दिनभर में ४० मीलकी मंजिल कर लेना तो मामूली बात थी। मेरा दृढ विश्वास है कि इस प्रयोगके आध्यात्मिक परिणाम बड़े सुंदर हुए। इस प्रयोगको अंशत: त्याग देना पड़ा, इसका दुख