पोलेकी यात्रा-१ १२६ 1 १२ : गोखलेकी यात्रा -१ इस तरह टाल्स्टाय फार्ममे सत्याग्रही अपनी farit बिता रहे थे और जो कुछ उनके नसीवमे लिखा था उसके लिए तैयार हो रहे थे। युद्ध कब समाप्त होगा इसका न उन्हे पता था, न चिंता थी। उनकी प्रतिज्ञा एक ही थी : खूनी कानूनके सामने सिर न झुकावगे और ऐसा करते हुए जो कष्ट सिरपर आगे उन्हें सह लेंगे। सिपाहीके लिए लहना ही जीत है; क्योकि इसमे ही वह सुख मानता है और चूकि कहना अपने हाथमे होता है इसलिए वह मानता है कि हार-जीत या सुख-दुख खुद मुझपर ही अवलबित है । या यों कह सकते है कि पराजय-जैसी चीज उसके शब्दकोपमें होती ही नहीं गीताके शब्दोमे कहूं तो उसके लिए सुख- दु.ख, हार-जीत समान है। इक्के-दुक्के सत्याग्रही जेल जाया करते थे । जब इसका मोका न हो तब फार्मके बाहरी कामोको देखकर कोई यह नही सोच सकता था कि इसमें सत्याग्रही रहते होगे और वे लडाकी तैयारी कर रहे होगे। फिर भी कोई नास्तिक वहां जा जाता तो वह मित्र होता तो हमपर तरस खाता और आकलो- चक होता तो हमारी निदा करता । कहता " आलस सबार हो गया है। इसीसे जगलमे पड़े-पड़े रोटियां खा रहे है। जेलसे हार गये है, इसलिए सुंदर फलोद्यानमे बसकर नियमित जीवन बिता और शहरके ममटीसे दूर रहकर सुख भोग रहे है ।" ऐसे आलोचकको कैसे समझाया जाय कि सत्याग्रही अयोग्य रीतिसे नीतिको भग करके जेल जा ही नही सकता ? उसे कौन समझाये कि सत्याग्रहीकी यातिमें, उसके सयममें
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