+ गोखलेको मात्रा - १ AM रद्दोबदल तो मैने किया, पर अधिकाश कार्यक्रम तो ज्यो-का- त्यो कायम रखना ही पहा | गोखलेको अधिक एकान्त मिलना आवश्यक था, यह में नहीं समझ सका था। ऐसा एकान्त दिलाने में मुझे अधिक-से-अधिक कठिनाई पडी । पर सत्यके खातिर मुझे नम्रतापूर्वक इतना तो कहना ही होगा कि रोगियो और वढोकी सेवा करनेका मुझे अभ्यास और शौक था, इससे अपनी मूर्खता जान लेनेके बाद मे प्रवधमे इतना सुधार कर सका कि उन्हें यथेष्ट एकान्त और शाति मिल सके। सारे दौरेमे उनके मंत्रीका काम मैने ही किया । स्वयं- सेवक ऐसे थे कि उन्हे अधेरी रातमे भी जाकर जवाब ला दे । अत सेवको प्रमादसे उन्हे कभी कोई कठिनाई हुई हो, इसकी मुझे याद नहीं । मि केनवेक भी इन स्वयसेवकोमे थे । केप टाउनमें अच्छी से अच्छी सभा होनी चाहिए, यह तो स्पष्ट ही था । श्राइतर कुटुबके बारेमें में प्रथम लड़ने लिख चुका हू । उसके मुखिया सिनेटर डब्ल्यू० पी० श्राइनरसे इस सभाका सभापतित्व स्वीकार करनेकी प्रार्थना की और उन्होने उसे स्वीकार कर लिया। विशाल सभा हुई। हिंदुस्तानी और यूरोपियन वडी सख्यामे उपस्थित हुए। मि० श्राइनरते मधुर गव्दोमे गोखलेका स्वागत किया और दक्षिण अफ्रीका के हिदुस्तानियो के साथ अपनी हमदर्दी जाहिर की । गोखलेका भाषण छोटा, परिपक्व विचारोंसे भरा हुआ, दृढ पर विनययुक्त था। उससे भारतीय प्रसन्न हुए और गोरोंका मन गोखलेने हर लिया। अत यह कह सकते है कि गोखलेने जिस दिन दक्षिण अफ्रीकाकी धरतीपर कदम रखा उसी दिन वहांकी पचरगी जनताके हृदयोमे प्रवेश कर गये । केप टाउनसे जोहान्स्वर्ग जाना था। रेलका दो दिनका सफर था । युद्धका कुरुक्षेत्र ट्रांसवाल था । केप टाउनसे आते हुए ट्रासचालका पहला बड़ा सरहदी स्टेशन क्लस्
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