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पृष्ठ:Gandhi - Dakshin Afrika Ke Satyagraha (Hindi).pdf/३४५

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! ३३८ दक्षिण अफ्रीकाका सत्याग्रह जबाव दिया- "जो बात आपने मेरी हिंदुस्तानीके बारेमे कही है वही मराठीकी भी समझिए। मराठीका एक अक्षर भी में बोल नहीं सकता । पर जिस विषयका मुझे ज्ञान है उस विषयपर आप मराठीमें जो कुछ कहेंगे उसका भावार्थ में जरूर समझ जाऊगा । इतना तो आप देख लेंगे कि में लोगोंके सामने उसका अनर्थ कदापि न करूंगा। मै आपको ऐसे उल्था करनेवाले दे सकता हूं जो मराठी अच्छी तरह समझते है, पर शायद आप इसको पसंद न करें। अतः मुझे निभा लीजिएगा और मराठीमे ही वोलिएगा। कोकणी भाइयोके जैसी मझे भी आपका मराठी भाषण सुननेकी हवस है ।" "तुम अपनी टेक जरूर रखना । यहा तुम्हारे पाले पहा हू, इसलिए छुटकारा थोडे ही पा सकता हूँ ।" यो कहकर मझे रिझाया और इसके बाद ऐसी सभाषोमे ठेठ जंजीवारतक मराठीने ही बोले और में उनका विशेष रूपसे नियुक्त भाषांतरकार रहा। मै नहीं जानता कि यह वात में उन्हें कहाँ तक समझा सका कि मुहावरेदार और व्याकरण-वृद्ध अंग्रेजी बोलनेकी अपेक्षा यथासभव मातृभाषा, यहां तक कि टूटी-फूटी व्याकरण-रहित हिंदीमें ही बोलना मुनासिव है । पर इतना जानता हूं कि दक्षिण अफ्रीकामे वह महज मुझे खुश करनेकी खातिर मराठीमें बोले । मराठीमें कुछ भाषण देनेके बाद इसके फलसे उन्हें भी प्रसन्नता हुई, यह में देख सका | गोखलेने दक्षिण अफ्रीका अनेक अवसरोंपर अपने व्यवहारसे यह दिखा दिया कि जहां सिद्धांतका प्रश्न नही वहां अपने सेवकोको प्रसन्न करना गुण है ।