गोखलेकी मात्रा - २ ३४१ यह सुनकर वह बोले-"मैं तुमसे जो कहता हूं उसमे फर्क पडनेवाला नही। मुझे जनरल बोधाने वचन दिया है कि खूनी कानून रद कर दिया जायगा और तीन पौडका कर उठा दिया जायगा । तुम्हे बारह महीनेके मदर हिंदुस्तान लौटना ही होगा। में तुम्हारा एक भी बहाना सुननेवाला नही ।" जोहान्स्वर्गका भाषण प्रिटोरियाकी यात्राके बाद हुआ था । सवालसे गोखले डर्बन, मेरित्सवर्ग आदि स्थानोंमें गये। वहां भी बहुतसे यूरोपियनोंसे मिले-जुले । किम्बरलीको होरेकी खान भी देखो। किम्बरली और ढबनमे भी स्वागत- महलकी बोरसे जोहान्स्वर्गकी जैसी दावते की गई और उनमे भी वहुतसे यूरोपियन सम्मिलित हुए । यों भारतीय और यूरो- पियन दोनों के मन हर कर गोखलेने १९१२ की १७वी नववर को दक्षिण अफ्रीका समुद्र-तटसे प्रस्थान किया। उनकी इच्छा- से में और मि० कैलनवेक जीवारतक उन्हें पहचाने गये । स्टीमरपर उनके लिए ऐसे भोजनका प्रबंध कर दिया था जो उनकी प्रकृतिके अनुकूल हो । रास्तेमे बेलागोआ बे, इनहाम- वेन, जजीवार आदि वदरगाहों पर भी उनका खूब सम्मान किया गया । स्टीमरपर हमारे बीच होनेवाली बातचीतका विषय केवल हिंदुस्तान या उसके प्रति हमारा धर्म ही होता । उनकी हर वातमें उनकी कोमल भावना, उनकी सत्यपरायणता और उनका स्वदेशाभिमान झलक उठता । मैने देखा कि स्टीमर- पर वह जो खेल खेलते उनमे भी लेलकी बनिस्वत हिंदुस्तान- की सेवाका भाव अधिक होता । उसमे भी संपूर्णता तो होनी ही चाहिए थी । स्टीमरपर हमे इतमीनानसे बातें करनेकी फुरसत तो रहती ही । इन वार्तालापोमे उन्होने मुझे हिंदुस्तानके लिए तैयार किया। भारतके हरएक नेताके चरित्रका विश्लेषण
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