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पृष्ठ:Gandhi - Dakshin Afrika Ke Satyagraha (Hindi).pdf/३७०

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मजदूरोकी धारा ३६३ अनुद्विग्न चित्तसे सहन करता ? इसने देखा कि ट्रांसवालकी बहने जो उसीके यहां टिकी हुई थी, गिरमिटियोकी मदद करने जाकर जेलखाने पहुच गई। भाई लाजरसने सोचा कि उनके प्रति उसका भी कुछ फर्ज है और मुझे आश्रय दे दिया। उसने मुझे आश्रय तो दिया ही, साथ ही अपना सर्वस्व अर्पण कर दिया। मेरे उसके यहा जानेके बाद उसका घर धर्मशाला वन गया। सैकडो आदमी और हर तरहके आदमी चाहे जब जाते और जाते । उसके घरके बासपासकी जमीन आदमियोसे खचाखच भर गई । उसका चूल्हा चौबीसो घटे जला करता । उसकी धर्मपत्नीको इसमें जी-तोड मेहनत करनी पडती । फिर भी पति-पत्नी दोनोंके चेहरे हर वक्त हँसते रहते। उनकी मुखाकृति मे मैने कभी अप्रसन्नता नही देखी। पर गरीब लाजरस क्या सैकडो मजदूरोको खिला सकता था ? मजदूरोको मेने सुना दिया कि उन्हें अपनी हडतालको स्थायी चीज समझकर मालिकोके दिये हुए झोंपडे खाली कर देने चाहिए । जो चीजे बिक सकती हो बेच डालो, बाकी सामानको कोठरी में पढा रहने दो। मालिक उसको हाथ नही लगायगे । पर और बदला चुकानेके लिए वे उसे उठाकर फेक दे तो मजदूरोको यह जोखिम भी उठानी होगी। मेरे पास वे पहनने के कपडे और ओढनेके कवरुके सिवा और कोई भी चीज न लाये । जवतक हडताल चलती रहेगी बोर जवतक वे जेलके बाहर रहेंगे तबतक में उन्हीके साथ रहूगा बोर खाऊगा-पिऊगा। इन शर्तोंके साथ वे खानोसे बाहर निकल आये तभी ये टिक सकते हैं और कौमकी जीत हो सकती है । जिसमें इसकी हिम्मत न हो वह अपने कामपर लौट जाय । जो कामपर वापस जाय, उसका कोई तिरस्कार न करे, उसको तंग न करे। इन गतको माननेसे किसीने इन्कार किया हो