३६४ दक्षिण अफ्रीकाका सत्याग्रह इसकी याद मुझे नहीं है । जिस दिन मैने कहा उसी दिनसे हिजरत करनेवालो-- गृहत्यागियोका ताता लग गया। सब अपने बीवी-बच्चोको साथ लिए सिरपर कपडोकी गठरी रखे पहुचने लगे। मेरे पास घरके नामपर तो सिर्फ खली जमीन थी। सौभाग्यवश उस मौसममे न चर्चा हो रही थी और न ठड ही पढ रही थी । मेरा विश्वास था कि भोजनका भार उठानेमे व्यापारी- वर्ग पीछे न रहेगा। न्यूकैसेलके व्यापारियोने पकाने के लिए वरतन दिये और चावल दालके बोरे भेजे। दूसरे स्थानोसे भी दाल, चावल, सब्जी, मसाले आदिकी वर्षा होने लगी। जितनेकी आशा में रखता था उससे कही अधिक ये चीजें मेरे पास जाने लगी। सब जेल जानेको तैयार न हो; पर सबकी हमदर्दी तो थी ही । सब इस यज्ञमें यथाशक्ति सहायतांके रूपमे अपना भाग अर्पण करनेको तैयार थे। जो कुछ देने लायक न थे उन्होने अपनी सेवा देकर मदद की । इन अनजान अपढ आदमियोको सम्हा- लनेके लिए जाने-पहचाने हुए और समझदार स्वयसेवक तो दरकार थे ही। वे मिल गये और उन्होंने अमूल्य सहायता की। उनमेसे बहुतेरे तो गिरफ्तार भी हुए । यो सबने यथाशक्ति सहायता की और हमारा रास्ता आसान हो गया । आदमियोकी भीड वढने लगी । इतने बडे और लगातार बढते जानेवाले मजदूरोके मजमेको एक ही स्थानमे बिना किसी काम-धंधे समेट रखना नामुमकिन नही तो खतरनाक जरूर था। उनकी शौच आदिकी आदते तो सुथरी होती ही नही थी। इस समुदायमे कितने ही ऐसे थे जो अपराध करके जेल भी हो आये थे । कोई हत्याका अपराधी था, कोई चोरीके जुर्म में कदकी सजा भुगतकर छूटा था, कोई व्यभि- चारके अपराधमें जेल काटकर आया था । हडताली मजदूरो- में नीतिका भेद मेरे किये नहीं हो सकता था। भेद करू भी
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