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पृष्ठ:Gandhi - Dakshin Afrika Ke Satyagraha (Hindi).pdf/३७२

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मजदूरोंकी धारा ३६५ सो अपना भेद मुझे कोन बतलाता ? में काजी वन बैठूं तो विवेकहीन वन् । मेरा काम केवल हडताल चलाना था ! इसमेदू सरे सुवारोको मिलाना मुमकिन नहीं था। छावनी- मे नीतिका पालन करना मेरा काम था । आनेवाले पहले कैसे थे, इसकी जाच करना मेरा फर्ज नही था । यह शिवकी बरात एक जगह जमकर बैठ जाय तो अपराध होना निश्चित था। अचरजकी बात तो यह थी कि जितने दिन मैंने यहां विताये वे शातिसे बीते । सब लोग ऐसी शातिसे रहे मानों उन्होने अपना आपद्धर्म समझ लिया हो । मुझे उपाय सुझा इस दस्तेको ट्रांसवाल ले जाऊं गोर जैसे पहलेके १६ आदमी गिरफ्तार हो गये वैसे इन्हे भी जेलमे विठा व । इन लोगोको छोटे-छोटे जत्थोंमे दू बांटकर उनसे सरहद पार कराऊं । यह विचार ज्योंही मनमे आया त्योंही उसे रद कर दिया। इसमे बहुत वक्त जाता और सामुदायिक कार्यका जो असर होता वह छोटे- छोटे जत्थोंकि जेल जानेका न होता । मेरे पास कोई पांच हजार मादमी इकट्ठा हुए होगे । इन सबको ट्रेनसे नहीं ले जा सकता था । इतना पैसा कहासे काऊ ? और इसमे लोगोकी परीक्षा भी नही हो सकती थी । न्यकैसे उसे ट्रांसवालकी सरहद ३६ मील थी। नेटालका सरहदी गांव चाल्सटाउन था, ट्रोसवालका बाक्सरस्ट । अंतमे मैने पैदल यात्रा करनेका ही निश्चय किया। मजदूरोके साथ मशविरा किया। उनके साथ स्त्रियां, बच्चे आदि थे । अत कछने आनाकानी की। मेरे पास दिल कडा करनेके सिवा दूसरा उपाय ही नही था। मेने लोगोसे कह दिया कि जिसे खान- पर वापस जाना हो वह जा सकता है । पर कोई वापस जाने- को तैयार न था। जो लोग अपंग ये उन्हें ट्रेनसे भेजनेका निष्चय किया । वाकी सब लोगोने कहा कि हम पैदल चलकर ।