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पृष्ठ:Gandhi - Dakshin Afrika Ke Satyagraha (Hindi).pdf/३७५

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३६६ दक्षिण का सत्याग्रह इस तरहकी बातचीत हुई। पूरी बातचीत मुझे इस वक्त याद नही आ सकती। जो वातें याद रह गई है उन्हे थोडेमें दे दिया है । में इतना जान सका कि मालिकोको अपना पक्ष पंगु जान पड़ा; क्योकि सरकारके साथ उनकी बात-चीत पहलेसे चल रही थी । डर्बन जाते और वहासे लौटते हुए मैने देखा कि रेलवेके गार्डों आदिपर इस हड़ताल और हडतालियोकी शांतिका बहुत अच्छा असर हुआ। मेरा सफर तो तीसरे ही दरजेमें चल रहा था। पर वहां भी गार्ड आदि रेलकर्मचारी मुके घेर लेते, दिलचस्पी भरे आग्रहके साथ हमारी लड़ाईके समाचार पूछते और सब हमारी विजय मनाते। मुझे अनेक प्रकारके छोटे- मोटे सुभीते कर देते। उनके साथ अपना सबंध में निर्मल रखता । एक भी सुभीते के लिए मैं उन्हें लालच न देता । अपनी इच्छासे वे भलमनसी बरतें तो मुझे उससे प्रसन्नता थी, पर भलमनसी खरीदनेकी कोशिश कभी नही की । गरीव, अपढ, नासमझ इतनी दृढ़ता दिखायें यह उनके लिए अचभेकी बात थी, और दृढ़ता तथा वीरता ऐसे गुण है जिनकी छाप विरोधीपर पढे बिना नही रहती । न्यूकसेल लौटा। मजदूरोंकी धारा तो चली ही आ रही थी । उनको सारी बातें बारीकीके साथ समझा दी। यह भी कह दिया कि आप लोग कामपुर वापस जाना चाहते हो तो जा सकते है । मालिकोंकी धमकीकी बात भी बताई और भविष्य- में जो जोखिमे उठानी थी उनका वर्णन भी कर दिया। कह दिया कि लड़ाई कब खत्म होगी यह भी नही कहा जा सकता । जेलके कष्ट समझा दिया। फिर भी मजदूर अडिग रहे । "जबतक आप लडनेको तैयार होगे तबतक हम हिम्मत हारने- वाले नही । हमे कष्ट सहनेका अभ्यास है। आप हमारी चिता न करे ।" यह निर्भय जवाब मुझे उनसे मिला ।